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गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

ज़मीं से दूर..बहुत दूर....

ज़मीं से दूर..बहुत दूर..आसमान में है.
मेरे जुनूं का परिंदा अभी उड़ान में है.

कहां से लायें अंधेरों से जूझने का रसूख
हमारे वक़्त का सूरज अभी ढलान में है.


एक और दिल भी धड़कता है मेरे सीने में 
मेरे सिवा भी कोई और इस मकान में है.

न पढ़ सकेगा, न सुनकर समझ सकेगा कोई
मेरी कहानी किसी और ही ज़बान में है.

हरेक जा उसे ढूंढा मगर मिला ही नहीं
वो एक शख्स जो हर एक दास्तान में है.

----देवेंद्र गौतम 

7 टिप्पणियाँ:

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

इक और दिल भी धड़कता है मेरे सीने में
मेरे सिवा भी कोई और इस मकान में है.
न पढ़ सकेगा, न सुनकर समझ सकेगा कोई
मेरी कहानी किसी और ही ज़बान में है.

bahut khoob !
waqai is zaban ko samajhna aasan nahin

रश्मि प्रभा... ने कहा…

एक और दिल भी धड़कता है मेरे सीने में
मेरे सिवा भी कोई और इस मकान में है.
are waah... bahut badhiyaa

नीरज गोस्वामी ने कहा…

कहां से लायें अंधेरों से जूझने का रसूख
हमारे वक़्त का सूरज अभी ढलान में है.

बेहतरीन देवेन्द्र भाई...बेहद खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने...ढेरों दाद कबूल करें...

नीरज

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

ज़मीं से दूर..बहुत दूर..आसमान में है.
मेरे जुनूं का परिंदा अभी उड़ान में है.
वाह ...क्या मत्ला है .....
कहां से लायें अंधेरों से जूझने का रसूख
हमारे वक़्त का सूरज अभी ढलान में है.
बिलकुल अलग हट के .....

एक और दिल भी धड़कता है मेरे सीने में
मेरे सिवा भी कोई और इस मकान में है.
बधाई .....):
न पढ़ सकेगा, न सुनकर समझ सकेगा कोई
मेरी कहानी किसी और ही ज़बान में है.
अच्छा ....फ़ारसी भी आती है आपको ....? ):

बहुत सुंदर ग़ज़ल .....!!

ghazalganga ने कहा…

हरकीरत हीर जी!
नमस्कार!
आप मेरे ब्लॉग पर आयीं. मेरा हौसला बढाया. इसके लिए शुक्रगुज़ार हूं. "किसी और ही ज़बान" का मतलब आपने फारसी से कैसे लगा लिया...?....मतलब साफ़ करने के लिए अपने दो शेर पेश कर रहा हूं----

+ये खामुशी भी तो खुद इक ज़बान होती है
मेरे सुकूत के अन्दर मेरा बयां निकला.

+उसने सदियों की दास्तां कह दी
एक लम्हे की बेज़ुबानी में.

अब आप समझ गयी होंगी कि मेरा इशारा किस ज़बान की तरफ था. बहरहाल स्नेह बनाये रखिये. इसकी मुझे सख्त ज़रूरत है.

देवेंद्र गौतम

ghazalganga ने कहा…

इस्मत जैदी जी...रश्मि प्रभा जी....नीरज गोस्वामी जी! हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया.
---देवेंद्र गौतम

स्वयम्बरा ने कहा…

akhir chacha kiske hai......

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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