समर्थक

मंगलवार, 24 मई 2011

डूबने वाले को......

डूबने वाले को तिनके के सहारे थे बहुत.
एक दरिया था यहां जिसके किनारे थे बहुत.

एक तारा मैं भी रख लेता तो क्या जाता तेरा
आस्मां वाले तेरे दामन में तारे थे बहुत.

वक़्त की दीवार से इक रोज  रुखसत हो गयी
हमने जिस तसवीर के सदके उतारे थे बहुत.


इक परिंदा भी मुक़द्दर में न था अफ़सोस है 
हमने अपनी जिंदगी में तीर मारे थे बहुत.

वक़्त की आंधी उसे इक दिन उड़ाकर ले गयी 
हमने जिस बरगद के नीचे दिन गुज़ारे थे बहुत.

उनकी नज़रें हमपे पड़ने की कोई सूरत न थी
वो घिरे थे भीड़ में और हम किनारे थे बहुत.

लाल, पीले और हरे रंगों में गुम थी जिंदगी 
शह्र में चारो तरफ दिलकश नज़ारे थे बहुत.

----देवेंद्र गौतम  

28 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

वक़्त की आंधी उसे इक दिन उड़ाकर ले गयी
हमने जिस बरगद के नीचे दिन गुज़ारे थे बहुत.
jane kitna kuch yun hi chala jata hai

शारदा अरोरा ने कहा…

बढ़िया , बहुत शुक्रिया ..

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

वक़्त की आंधी उसे इक दिन उड़ाकर ले गयी
हमने जिस बरगद के नीचे दिन गुज़ारे थे बहुत.

लाजावाब शेर...
बहुत उम्दा ग़ज़ल कही है आपने.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वक़्त की आंधी उसे इक दिन उड़ाकर ले गयी
हमने जिस बरगद के नीचे दिन गुज़ारे थे बहुत.

उनकी नज़रें हमपे पड़ने की कोई सूरत न थी
वो घिरे थे भीड़ में और हम किनारे थे बहुत.

बहुत खूबसूरत गज़ल

Sunil Kumar ने कहा…

लाल, पीले और हरे रंगों में गुम थी जिंदगी शह्र में चारो तरफ दिलकश नज़ारे थे बहुत.

लाजावाब शेर...
बहुत खूबसूरत गज़ल...

Babli ने कहा…

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने लाजवाब ग़ज़ल लिखा है जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

आसान बातें आसान शब्दों में गंभीर मंतव्यों के साथ| बधाई इस ग़ज़ल के लिए मान्यवर|

सदा ने कहा…

वक़्त की आंधी उसे इक दिन उड़ाकर ले गयी
हमने जिस बरगद के नीचे दिन गुज़ारे थे बहुत.

वाह .. बहुत खूब कहा है इन पंक्तियों में ।

Shah Nawaz ने कहा…

बहुत बढ़िया... बेहद खूबसूरत ग़ज़ल है... हर एक शेअर लाजवाब है!!!

विशाल ने कहा…

बहुत खूब,देवेन्द्र भाई.
पूरी ग़ज़ल लाजवाब है.
हर शेर अपनी कहानी खुद बयां कर रहा है.

ਜੀਵਨ ਦੀ ਬਾਜੀ ਜੇ ਹਾਰੇ ਨਾ ਹੁੰਦੇ,
ਦੁਨੀਆ'ਚ ਲਭਦੇ ਸਹਾਰੇ ਨਾ ਹੁੰਦੇ.

शुभ कामनाएं.

शिखा कौशिक ने कहा…

bahut bahut sundar

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

बहुत ही सुन्दर,शानदार और उम्दा प्रस्तुती!

Udan Tashtari ने कहा…

वक़्त की आंधी उसे इक दिन उड़ाकर ले गयी
हमने जिस बरगद के नीचे दिन गुज़ारे थे बहुत.



-वाह!!! कितना गहरा अर्थ लिए शेर कहा है...बहुत उम्दा!!

Vivek Jain ने कहा…

बहुत खूबसूरत गज़ल
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

दिगम्बर नासवा ने कहा…

एक तारा मैं भी रख लेता तो क्या जाता तेरा
आस्मां वाले तेरे दामन में तारे थे बहुत...
वह देवेन्द्र जी .... बहुत खूब ... लाजवाब ग़ज़ल है ... हर शेर पर वाह वाह निकलती है ... सुभान अल्ला ... कुर्बान हूँ इस शेर पर ...

Kunwar Kusumesh ने कहा…

प्यारी ग़ज़ल. हर शेर क़ाबिले-दाद.बरगद वाला शेर ग़ज़ब का है.

daanish ने कहा…

एक तारा मैं भी रख लेता तो क्या जाता तेरा
आस्मां वाले तेरे दामन में तारे थे बहुत
बिलकुल सही शिकवा है
ग़ज़ल ही का शेर,,, अच्छा बन पडा है...
वक़्त की दीवार से इक रोज रुखसत हो गयी
हमने जिस तसवीर के सदके उतारे थे बहुत
ये शेर तो ग़ज़ल की जान है... बहुत खूब .. !!
और.... हम किनारे थे बहुत....
वाह,,, आपका अपना मुनफ़रिद अंदाज़ ,, वाह !!!

pragya ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत देवेन्द्र जी, बहुत ही ख़ूबसूरत....

संजय भास्कर ने कहा…

लाजावाब शेर...
बहुत खूबसूरत गज़ल..

संजय भास्कर ने कहा…

वाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

वक़्त की आंधी उसे इक दिन उड़ाकर ले गयी
हमने जिस बरगद के नीचे दिन गुज़ारे थे बहुत

बहुत ख़ूबसूरत ,बामक़सद शेर जो अपने अंदर बड़ी गहराइयां समेटे हुए है

एक तारा मैं भी रख लेता तो क्या जाता तेरा
आस्मां वाले तेरे दामन में तारे थे बहुत.

ख़ुदा से शिकायत का बेहद मासूम अंदाज़

अच्छी ग़ज़ल के लिये मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाएं

Raina ने कहा…

वक़्त की आंधी उसे इक दिन उड़ाकर ले गयी
हमने जिस बरगद के नीचे दिन गुज़ारे थे बहुत
BOhot khoobsoorat!! Badhai...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 31 - 05 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

इक परिंदा भी मुक़द्दर में न था अफ़सोस है
हमने अपनी जिंदगी में तीर मारे थे बहुत.

बेहतरीन ग़ज़ल ... हरेक शेर मुकम्मल और लाजवाब है ...

ग़ज़ल में अब मज़ा है क्या ?

निवेदिता ने कहा…

बेहतरीन ग़ज़ल ...........

mridula pradhan ने कहा…

उनकी नज़रें हमपे पड़ने की कोई सूरत न थी
वो घिरे थे भीड़ में और हम किनारे थे बहुत.
ek-ek shabd lazabab.

कुश्वंश ने कहा…

वक़्त की दीवार से इक रोज रुखसत हो गयी
हमने जिस तसवीर के सदके उतारे थे बहुत.


खूबसूरत गज़ल

Rajeev Bharol ने कहा…

एक और लाजवाब गज़ल.."एक तारा मैं भी रख लेता तो क्या जाता तेरा...", "वक़्त की आंधी उसे इक दिन उड़ाकर ले गयी..", "उनकी नज़रें हमपे पड़ने की कोई सूरत न थी.." बहुत ही उम्दा.. बधाई.

एक टिप्पणी भेजें

कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

अच्छी-बुरी जो भी हो...प्रतिक्रिया अवश्य दें