समर्थक

गुरुवार, 22 मार्च 2012

आदमी के भेष में शैतान था


आदमी के भेष में शैतान था.
हम समझते थे कि वो भगवान था.

एक-इक अक्षर का उसको ज्ञान था.
उसके घर में वेद था, कुरआन था.

सख्त था बाहर की दुनिया का सफ़र
घर की चौखट लांघना आसान था.


ख्वाहिशें मुर्दा पड़ी थीं जा-बा-जा
दिल भी गोया एक कब्रिस्तान था.

रूह की कश्ती में कुछ हलचल सी थी
जिस्म के अंदर कोई तूफ़ान था.

हर कदम पर था भटक जाने का डर
शहर के रस्तों से मैं अनजान था.

ख्वाहिशों की दौड़ में शामिल थे हम
दूर तक फैला हुआ मैदान था.

मैं निहत्था था मगर लड़ता रहा
चारो जानिब जंग का मैदान था.

मौत की पगडंडियों पे भीड़ थी
जिन्दगी का रास्ता वीरान था.

अपनी किस्मत आप ही लिखता था मैं
जब तलक मेरा समय बलवान था.

इतनी बेचैनी भी होती है कहीं
मैं समंदर देखकर हैरान था.

---देवेंद्र गौतम









21 टिप्‍पणियां:





  1. आदमी के भेष में शैतान था
    हम समझते थे कि वो भगवान था

    एक-इक अक्षर का उसको ज्ञान था
    उसके घर में वेद था, कुरआन था


    वाह वाह !
    बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है
    मुबारकबाद !

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह!!!!!!!!!!!
    बहुत खूबसूरत गज़ल...

    रूह की कश्ती में कुछ हलचल सी थी
    जिस्म के अंदर कोई तूफ़ान था.

    चैत्र नवरात्र और नव संवत की आपको मंगलकामनाएं..
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति| नवसंवत्सर २०६९ की हार्दिक शुभकामनाएँ|

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाकई खूबसूरत। मेरा पसंदीदा - सख्त था बाहर की दुनिया का सफ़र
    घर की चौखट लांघना आसान था

    उत्तर देंहटाएं
  5. रवीन्द्र नाथ सिन्हा23 मार्च 2012 को 10:43 am

    गौतम भाई,
    क्या खूब लिखते हैं आप |ईश्वर आप की लेखनी को दिन प्रति दिन समृधी प्रदान करें |

    उत्तर देंहटाएं
  6. सख्त था बाहर की दुनिया का सफ़र
    घर की चौखट लांघना आसान था.
    बिल्कुल सच्ची बात कही आप ने लेकिन चौखट लाँघते वक़्त ये बात कहाँ समझ में आती है

    ख्वाहिशें मुर्दा पड़ी थीं जा-बा-जा
    दिल भी गोया एक कब्रिस्तान था.
    बहुत खूब !!
    हमेशा की तरह उम्दा ग़ज़ल

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!
    नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  8. सख्त था बाहर की दुनिया का सफ़र
    घर की चौखट लांघना आसान था.
    जिन्दगी की मेजबानी क्या कहें
    हर कोई दो रोज का मेहमान था.
    इतनी बेचैनी भी होती है कहीं
    मैं समंदर देखकर हैरान था.....

    उम्दा गज़ल

    उत्तर देंहटाएं
  9. जिन्दगी की मेजबानी क्या कहें
    हर कोई दो रोज का मेहमान था.

    इतनी बेचैनी भी होती है कहीं
    मैं समंदर देखकर हैरान था.
    सख्त था बाहर की दुनिया का सफ़र
    घर की चौखट लांघना आसान था.

    बेहद उम्दा

    उत्तर देंहटाएं
  10. वाह .. क्या गज़ब के शेर हैं सभी इस लाजवाब गज़ल में ... किसी एक को कोट करना आसान नहीं देवेन्द्र जी ...

    उत्तर देंहटाएं

कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

अच्छी-बुरी जो भी हो...प्रतिक्रिया अवश्य दें