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गुरुवार, 12 जुलाई 2012

देवता जितने भी थे पत्थर के थे

कुछ ज़मीं के और कुछ अम्बर के थे.
अक्स  सारे  डूबते  मंज़र  के  थे.

कुछ इबादत का सिला मिलता न था
देवता जितने भी थे पत्थर के थे.

दिल में कुछ, होठों पे कुछ, चेहरे पे कुछ
किस कदर मक्कार हम अंदर के थे.


खुल के कुछ कहने की गुंजाइश न थी
हम निशाने पर किसी खंज़र के थे.

आस्मां को नापना मुश्किल न था
फ़िक्र में हमलोग बालो-पर के थे.

उलझनों में इस कदर जकड़े थे हम
हम न दफ्तर के न अपने घर के थे.

तोड़ डाली वक़्त ने सारी अकड़
तेज़ वर्ना हम भी कुछ तेवर के थे.

-----देवेंद्र गौतम



7 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

दिल में कुछ, होठों पे कुछ, चेहरे पे कुछ
किस कदर मक्कार हम अंदर के थे.

खुल के कुछ कहने की गुंजाइश न थी
हम निशाने पर किसी खंज़र के थे.

बहुत खूब ...बढ़िया गज़ल

vandana ने कहा…

बहुत शानदार गज़ल

सदा ने कहा…

उलझनों में इस कदर जकड़े थे हम
हम न दफ्तर के न अपने घर के थे.

तोड़ डाली वक़्त ने सारी अकड़
तेज़ वर्ना हम भी कुछ तेवर के थे.

वाह ... अनुपम प्रस्‍तुति।

शारदा अरोरा ने कहा…

वाह , बहुत खूब

expression ने कहा…

वाह वाह

दीपिका रानी ने कहा…

बहुत दिनों बाद एक खू़बसूरत ग़ज़ल पढ़ने को मिली..

nuktachini ने कहा…

wah...kya baat hai...

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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