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रविवार, 1 जुलाई 2012

पूरा करें तो कैसे करें दास्तान को

पूरा करें तो कैसे करें दास्तान को.
हर पल बदल रहे हैं वो अपने बयान  को.

इस घर की कहानी भी अजीबो-गरीब है
मेहमां बना के रख दिया है मेज़बान को.


बिजली सी भर गयी है परिंदों के परों में
मुमकिन नहीं है रोकना उनकी उड़ान को.

तपने लगी ज़मीं तो पिघलने लगा फलक
फिर बादलों ने घेर लिया आसमान को.

अब कौम और मज़हब की कोई जंग नहीं है
हमने बढ़ा दिया है जुनूं की दुकान को.

कैसे पता चलेगा कहां पर गिरी थी लाश?
उसने मिटा दिया है लहू  के निशान को.

पीपल का पेड़ आज भी महफूज़ है मगर
कोई उड़ा के ले गया गौतम के ज्ञान को.

----देवेंद्र  गौतम


11 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वाह ॥बहुत खूबसूरत गजल

सदा ने कहा…

वाह ... बेहतरीन प्रस्‍तुति‍।

kshama ने कहा…

पूरा करें तो कैसे करें दास्तान को.
हर पल बदल रहे हैं वो अपने बयान को.

Shayad yahee mere jeewan kee dastan hai...

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

सभी शेर बहुत बढ़िया बन पड़े हैं गौतम जी .....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कोई बता सकेगा कहां पर गिरी थी लाश?
उसने मिटा दिया है लहू के निशान को.

जबरस्त ... कमाल की गज़ल है गौतम जी ... सभी शेर जमाने का चलन बयान कर रहे हैं ... सुभा अल्ला ... मज़ा आ गया ..

निर्मला कपिला ने कहा…

हर इक शेर लाजवाब है लेकिन---
पीपल का पेड़ आज भी महफूज़ है मगर
कोई उड़ा के ले गया गौतम के ज्ञान को.

ये शेर तो कमाल है बधाई आपकिओ।

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

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उम्दा प्रस्तुति के लिए आभार


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संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 05 -07-2012 को यहाँ भी है

.... आज की नयी पुरानी हलचल में .... अब राज़ छिपा कब तक रखे .

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 05 -07-2012 को यहाँ भी है

.... आज की नयी पुरानी हलचल में .... अब राज़ छिपा कब तक रखे .

Kailash Sharma ने कहा…

पीपल का पेड़ आज भी महफूज़ है मगर
कोई उड़ा के ले गया गौतम के ज्ञान को.


....बहुत खूब! बेहतरीन गज़ल...

शारदा अरोरा ने कहा…

bahut jaandaar likha hai..

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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