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बुधवार, 25 जुलाई 2012

हमसफ़र कोई न था फिर भी सफ़र करता रहा

अपनी सारी ख्वाहिशों को दर-ब-दर करता रहा.
हमसफ़र कोई न था फिर भी सफ़र करता रहा.

एक तुम जिसको किसी पर भी नहीं आया यकीं
एक मैं जो हर किसी को मोतबर करता रहा.

बेघरी ने तोड़ डाला था उसे अंदर  तलक
इसलिए वो हर किसी के दिल में घर करता रहा .


काश! वो आकर मेरी तहरीर पढ़ लेता कभी
हर वरक जिसके लिए अश्कों से तर करता रहा.

धीरे-धीरे सांस भी उल्टी तरफ चलने लगी
धीरे-धीरे जह्र भी अपना असर करता रहा.

शह्र की सड़कों पे मेरे पांव ठहरे ही नहीं
गांव की पगडंडियों पे मैं गुजर करता रहा.

----देवेंद्र गौतम


24 टिप्पणियाँ:

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

काश! वो आकर मेरी तहरीर पढ़ लेता कभी
हर वरक जिसके लिए अश्कों से तर करता रहा.

हमने तो पढ़ ली .....
उन्हें भी लिंक भेजा होगा तो जरुर पढ़ लेंगे ....:))

लाजवाब ग़ज़ल ....!!

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

बहुत ख़ूब्सूरत बहुत ही अच्छी ग़ज़ल है ,,किसी एक शेर को छाँटना मुश्किल है इस ग़ज़ल में ,,बहुत ख़ूब !!
हर शेर अपनी अह्मियत और इन्फ़ेरादियत के साथ जलवागर है !!मुबारक हो !

expression ने कहा…

वाह....
बेहतरीन गज़ल...
काश! वो आकर मेरी तहरीर पढ़ लेता कभी
हर वरक जिसके लिए अश्कों से तर करता रहा.

खूबसूरत शेर...

अनु

दीपिका रानी ने कहा…

इतनी खूबसूरत ग़ज़ल पढ़कर क्या कहें... वाह!

kshama ने कहा…

Behad sundar! Ise apni maa ko suaungi!

सदा ने कहा…

वाह ... बहुत खूब ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बेघरी ने तोड़ डाला था उसे अंदर तलक
इसलिए वो हर किसी के दिल में घर करता रहा .

काश! वो आकर मेरी तहरीर पढ़ लेता कभी
हर वरक जिसके लिए अश्कों से तर करता रहा.

बहुत खूबसूरत गज़ल ....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

काश! वो आकर मेरी तहरीर पढ़ लेता कभी
हर वरक जिसके लिए अश्कों से तर करता रहा.

सुभान अल्ला ... क्या गज़ब का शेर है देवेन्द्र जी ... आपकी ग़ज़लें सीधे दिल में उतर जाती हैं ... नायाब मोती की तरह चमकता है हर शेर ...

शारदा अरोरा ने कहा…

बहुत खूबसूरत ...

निर्मला कपिला ने कहा…

काश! वो आकर मेरी तहरीर पढ़ लेता कभी
हर वरक जिसके लिए अश्कों से तर करता रहा.

बहुत खूब। अच्छी गज़ल के लिये बधाई

निर्मला कपिला ने कहा…

काश! वो आकर मेरी तहरीर पढ़ लेता कभी
हर वरक जिसके लिए अश्कों से तर करता रहा.

बहुत खूब। अच्छी गज़ल के लिये बधाई

bkaskar bhumi ने कहा…

देवेंद्र गौतम जी नमस्कार...
आपके ब्लॉग 'गजलगंगा' से कविता भास्कर भूमि में प्रकाशित किए जा रहे है। आज 27 जुलाई को 'हम सफर कोई ना था फिर भी सफर करता रहा' शीर्षक के कविता को प्रकाशित किया गया है। इसे पढऩे के लिए bhaskarbhumi.com में जाकर ई पेपर में पेज नं. 8 ब्लॉगरी में देख सकते है।
धन्यवाद
फीचर प्रभारी
नीति श्रीवास्तव

बेनामी ने कहा…

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नीरज गोस्वामी ने कहा…

देवेन्द्र जी ,आपके ब्लॉग पर देरी से आने के लिए पहले तो क्षमा चाहता हूँ. कुछ ऐसी व्यस्तताएं रहीं के मुझे ब्लॉग जगत से दूर रहना पड़ा...अब इस हर्जाने की भरपाई आपकी सभी पुरानी रचनाएँ पढ़ कर करूँगा....कमेन्ट भले सब पर न कर पाऊं लेकिन पढूंगा जरूर

बेघरी ने तोड़ डाला था उसे अंदर तलक
इसलिए वो हर किसी के दिल में घर करता रहा .

वाह...वाह...वाह...हर ek शेर मोती की तरह पिरोया आपने इस ग़ज़ल में मेरी दिली दाद कबूल करें.
नीरज

mahendra verma ने कहा…

शह्र की सड़कों पे मेरे पांव ठहरे ही नहीं
गांव की पगडंडियों पे मैं गुजर करता रहा.

ख़ूबसूरत पंक्तियां।

dr.mahendrag ने कहा…

एक तुम जिसको किसी पर भी नहीं आया यकीं
एक मैं जो हर किसी को मोतबर करता रहा.

ACHHI KHOOBSURAT GAZAL

बेनामी ने कहा…

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bahut hi gahre paith kar kahe hain ye sher. dil ko chhoo jane wale. badhai..

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आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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