समर्थक

शनिवार, 15 सितंबर 2012

लुटेरों की निगहबानी में रहना

लुटेरों की निगहबानी में रहना.
तुम अपने घर की दरबानी में रहना.

अगर इस आलमे-फानी में रहना.
तो बनकर बुलबुला पानी में रहना.

शरीयत कौन देता है किसी का
नमक बनकर नमकदानी में रहना.

यही हासिल है शायद जिंदगी का
हमेशा लाभ और हानि में रहना.

ये रहना भी कोई रहना है यारब!
जहां रहना परेशानी में रहना.

बनाना मछलियों का एक दस्ता
मगर से वैर कर पानी में रहना.

कुछ ऐसे दोस्ती अपनी निभाना
पड़े दुश्मन को हैरानी में रहना.

तुम्हारे शह्र में रहने से अच्छा
कहीं जाकर बयाबानी में रहना.

----देवेंद्र गौतम




10 टिप्पणियाँ:

Reena Maurya ने कहा…

बहुत बढ़िया गजल
एक-एक शेर लाजवाब है...
शानदार...
:-)

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बनाना मछलियों का एक दस्ता
मगर से वैर कर पानी में रहना.
वाह देवेन्द्र जी ... गज़ब के शेर निकाले हैं आपने ... और क्या लफ़्ज़ों का इस्तेमाल है ... भई सुभान अल्ला ...
पूरी गज़ल लाजवाब ...

jaat na puchho.... ने कहा…

bahut khoob!

jitendra sinha ने कहा…

बहुत बढ़िया ग़ज़ल

शारदा अरोरा ने कहा…

बहुत बढ़िया ...

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार १८/९/१२ को चर्चा मंच पर चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका चर्चा मच पर स्वागत है |

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार १८/९/१२ को चर्चा मंच पर चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका चर्चा मच पर स्वागत है |

Virendra Kumar Sharma ने कहा…


तुम्हारे शह्र में रहने से अच्छा
कहीं जाकर बयाबानी में रहना.
एक सशक्त हस्ती को पढवाया चर्चा मंच ने शुक्रिया दोनों का .

Read more: http://www.gazalganga.in/2012/09/blog-post.html#ixzz26mSkOomw

सदा ने कहा…

वाह ... बेहतरीन ।

kamlesh kumar diwan ने कहा…

achchi gajal hai

एक टिप्पणी भेजें

कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

अच्छी-बुरी जो भी हो...प्रतिक्रिया अवश्य दें