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सोमवार, 10 सितंबर 2012

हमने रिश्ता बहाल रखा था

एक सांचे में ढाल रखा था.
हमने सबको संभाल रखा था.

एक सिक्का उछाल रखा था.
और अपना सवाल रखा था.

सबको हैरत में डाल रखा था.
उसने ऐसा कमाल रखा था.

कुछ बलाओं को टाल रखा था.
कुछ बलाओं को पाल रखा था.

हर किसी पर निगाह थी उसकी
उसने सबका ख़याल रखा था.

गीत के बोल ही नदारत थे
सुर सजाये थे, ताल रखा था.

उसके क़दमों में लडखडाहट थी
उसके घर में बवाल रखा था.

उसकी दहलीज़ की रवायत थी
हमने सर पर रुमाल रखा था.

साथ तुम ही निभा नहीं पाए
हमने रिश्ता बहाल रखा था.

-देवेंद्र गौतम

6 टिप्पणियाँ:

Dr. Ayaz Ahmad ने कहा…

कुछ बलाओं को टाल रखा था.
कुछ बलाओं को पाल रखा था.

habib kavishi ने कहा…

अच्छी ग़ज़ल

सदा ने कहा…

वाह ... बहुत ही बढिया

दिगम्बर नासवा ने कहा…

हर किसी पर निगाह थी उसकी
उसने सबका ख़याल रखा था.

वाह क्या बात है ... इतनी सारे काफिये ... लाजवाब गज़ल देवेन्द्र जी ... हर शेर कमाल है ..

expression ने कहा…

कुछ बलाओं को टाल रखा था.
कुछ बलाओं को पाल रखा था.

वाह...
बहुत खूब...

सादर
अनु

jitendra sinha ने कहा…

बढ़िया ग़ज़ल

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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