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बुधवार, 26 सितंबर 2012

हम अपने दुश्मनों को भी रुसवा नहीं करते


हक मिलता मांगने से तो लफड़ा नहीं करते.
हम तो तमाशबीं थे तमाशा नहीं करते.

लफ़्ज़ों के हेर-फेर का धंधा नहीं करते.
हम खुल के बोलते हैं कि पर्दा नहीं करते.

मेहमां बना के रखते हैं अपनी ज़मीन पर
हम अपने दुश्मनों को भी रुसवा नहीं करते.

जो बांटते हैं रौशनी सारे जहान को
जलते हुए दिये को बुझाया नहीं करते.

जो बात जिस जगह की है रखते हैं हम वहीं
हर बात हर किसी को बताया नहीं करते.

आईना हर किसी को दिखाते हैं हम, मगर
कीचड कभी किसी पे उछाला नहीं करते.

अपनी हदों को जानते हैं हम इसीलिए
मुट्ठी में आस्मां को समेटा नहीं करते.

---देवेंद्र गौतम

6 टिप्पणियाँ:

रविकर ने कहा…

हम अपने दुश्मनों को भी रुसवा नहीं करते ||
बहुत बढ़िया भाई जी-


रांची में हम सब ११-१२ अक्तूबर को मिल सकते हैं क्या-
अन्यथा धनबाद में कार्यक्रम कर सकते हैं-

श्यामल सुमन जी जमशेदपुर में हैं-
उनकी और से भी सहयोग मिल रहा है |

सदा ने कहा…

वाह ... बहुत खूब।

devendra gautam ने कहा…

भाई रविकर जी! कुछ और मित्रों की सहमति आ जाये फिर तय कर लेंगे

vandana ने कहा…

लफ़्ज़ों के हेर-फेर का धंधा नहीं करते.
हम खुल के बोलते हैं कि पर्दा नहीं करते.
आईना हर किसी को दिखाते हैं हम, मगर
कीचड कभी किसी पे उछाला नहीं करते.


बहुत बढ़िया शेर

sunitadixit ने कहा…

मेहमां बना के रखते हैं अपनी ज़मीन पर
हम अपने दुश्मनों को भी रुसवा नहीं करते.
अपनी हदों को जानते हैं हम इसीलिए
मुट्ठी में आस्मां को समेटा नहीं करते.

WAH BAHOT HI UMDA SHER.... laajawab..!!


शारदा अरोरा ने कहा…

bahut khoob...kaha..

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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