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बुधवार, 10 अक्तूबर 2012

जाने अपना तन कहां है मन कहां

वो खुला माहौल वो जीवन कहां
घर तो है घर में मगर आंगन कहां..

हर तअल्लुक एक जरूरत की कड़ी
आज कच्चे धागों का बंधन कहां.

मन के अन्दर विष भी है अमृत भी है
इस समंदर का मगर मंथन कहां.

हमने माना पेड़ लगवाए बहुत
नीम,बरगद, साल और चंदन कहां.

सोच का मर्कज़ कहीं दिखता नहीं
जाने अपना तन कहां है, मन कहां.

मौसमों के कह्र से राहत नहीं
जेठ है, बैसाख है, सावन कहां.

हर बरस पुतले जलाते रह गए
आजतक लेकिन जला रावण कहां.

----देवेंद्र गौतम






9 टिप्‍पणियां:

  1. हर बरस पुतले जलाते रह गए
    आजतक लेकिन जला रावण कहां.

    bilkul sahi baat.achchhi gazal. badhai!


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  2. हर बरस पुतले जलाते रह गए
    आजतक लेकिन जला रावण कहां.

    क्या बात है ! ,,बहुत उम्दा अश’आर कहे हैं
    ख़ूबसूरत ग़ज़ल !!

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  3. हमने माना पेड़ लगवाए बहुत
    नीम,बरगद, साल और चंदन कहां.

    मौसमों के कह्र से राहत नहीं
    जेठ है, बैसाख है, सावन कहां.

    देवेन्द्र भाई क्या कमाल की ग़ज़ल कही है....हर शेर गज़ब का है...दाद कबूल करें..

    नीरज

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  4. बहुत सुंदर रचना.....ख़ूबसूरत ग़ज़ल.....

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  5. 'मन के अन्दर विष भी है अमृत भी है
    इस समंदर का मगर मंथन कहां.'

    -बहुत अच्छा !

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  6. सोच का मर्कज़ कहीं दिखता नहीं
    जाने अपना तन कहां है, मन कहां.

    aisi manahsthiti to hoti hai. manovagyanik sher hai.

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  7. हर बरस पुतले जलाते रह गए
    आजतक लेकिन जला रावण कहां.

    Wah..Bahot hi achche

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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