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रविवार, 24 फ़रवरी 2013

बस्तियां बसती गयीं और दफ़्न वीराने हुए

                           कत्ता    
अपनी बातें गौर से सुनने की जिद ठाने हुए.
बीच रस्ते में खड़े हैं रस्सियां ताने हुए.
माजरा क्या है हमें कोई बताता ही नहीं
कौन हैं ये लोग? न जाने, न पहचाने हुए.
              
          
इस ज़मीं पे आजतक जितने भी मयखाने हुए.
जिंदगी को देखने के उतने पैमाने हुए.

लोग कहते हैं यहां ऐसे भी दीवाने हुए.
दर्दो-गम जिनके लिए उल्फत के नजराने हुए.

रोज जिनकी राह में शमए जलाती थी हवा
रोज अंगारों से खेले ऐसे परवाने हुए.

एक जंगल था यहां पर दूर तक फैला हुआ
बस्तियां बसती गयीं और दफ़्न वीराने हुए.

रंग गिरगिट का बदल जाता है मौसम देखकर
वो कभी अपने भी थे? जो आज बेगाने हुए.

आजतक लेकिन न मिल पाया कभी अपना सुराग
मंजिलें जानी हुई, रस्ते भी पहचाने हुए.

---देवेंद्र गौतम

7 टिप्पणियाँ:

Rajendra Kumar ने कहा…

बहुत सुन्दर ग़ज़ल.

Anju (Anu) Chaudhary ने कहा…

बहुत खूब

शालिनी कौशिक ने कहा…

रंग गिरगिट का बदल जाता है मौसम देखकर
वो कभी अपने भी थे? जो आज बेगाने हुए.
जबरदस्त कटाक्ष आभार अकलमंद ऐसे दुनिया में तबाही करते हैं . आप भी जानें हमारे संविधान के अनुसार कैग [विनोद राय] मुख्य निर्वाचन आयुक्त [टी.एन.शेषन] नहीं हो सकते

vandana ने कहा…

आजतक लेकिन न मिल पाया कभी अपना सुराग
मंजिलें जानी हुई, रस्ते भी पहचाने हुए.

bahut badhiya gazal

शारदा अरोरा ने कहा…

बढ़िया लगी ग़ज़ल ...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

एक जंगल था यहां पर दूर तक फैला हुआ
बस्तियां बसती गयीं और दफ़्न वीराने हुए.

बसाहट ही खूबसूरत शेर .... यूं तो हर शेर लाजवाब अहि पर इस शेर में कुछ खास है जो दिल में उतर जाता है ...
साथ लिए जा रहा हूं इसे ...

jitendra sinha ने कहा…

एक जंगल था यहां पर दूर तक फैला हुआ
बस्तियां बसती गयीं और दफ़्न वीराने हुए.

kya gazab kee baat kahi hai....

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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