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शनिवार, 30 मार्च 2013

मतलब निकालते रहो मेरे बयान का

चक्कर लगा के देख चुके आसमान का.
अब खौफ ही नहीं रहा अगली उड़ान का.

परछाइयों के बीच उसे ढूंढते हैं हम
शायद कोई वजूद हो वहमो-गुमान का.

मेरी हरेक बात में शामिल है और बात
मतलब निकालते रहो मेरे बयान का.

चारो तरफ है जाल बराबर बिछा हुआ
खतरा बना हुआ है परिंदे की जान का.

मुझमें सिमट के बैठ गया है जो एक शख्स
किरदार बन गया है मेरी दास्तान का.

बेचैनियों के बीच से होकर गुजर गया
इक पल अगर मिला भी कभी इत्मिनान का.

उसकी नजर गड़ी थी परिंदे की आंख पर
हर तीर था निशाने पर उसके कमान का.

दीवारे-दर को दे गया अपने तमाम अक्स
नक्शा बदल के रख दिया मेरे मकान का.

क्या जाने आज कौन सा मंजर दिखायी दे
बदला हुआ है रंग अभी आसमान का.

गौतम हमारी बात का गर तू बुरा न मान
हर लफ्ज़ आज बख्श दे अपनी जु़बान का.

--देवेंद्र गौतम



8 टिप्पणियाँ:

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) ने कहा…

प्रभावशाली ,
जारी रहें।

शुभकामना !!!

आर्यावर्त

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Rajendra Kumar ने कहा…

बहु ही बेहतरीन प्रस्तुति है जनाब,धन्यबाद.

सुमन कपूर 'मीत' ने कहा…

बहुत सुंदर

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मेरी हरेक बात में शामिल है और बात
मतलब निकालते रहो मेरे बयान का.
\वाह ... लाजवाब शेर हैं सभी इस गज़ल के ... मज़ा आ गया ... सुभानाल्ला ...

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

वाह ! लाजवाब ग़ज़ल ....!!
सभी शेर बहुत ही उम्दा ....
कैसे लिख लेते हैं इतना अच्छा ....?

Ravindra Sinha ने कहा…

Very fine ghazal.

Ashok Khachar ने कहा…

bhot khub waaaaah

O.P.Pandey ने कहा…

kya baat hai bhaiya..." baat na band karein, warna kaise matalab nikalega , aapke bayaan ka..."

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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