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रविवार, 7 अप्रैल 2013

कत्ता


हवा की जद में इक भटका हुआ लश्कर निकल आया

धुआं चिमनी में कालिख छोड़कर बाहर निकल आया.

तुम्हारा जी भी हल्का हो गया शिकवा शिकायत से

हमारे दिल पे भी रक्खा हुआ पत्थर निकल आया.


---देवेंद्र गौतम

7 टिप्पणियाँ:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

तुम्हारा जी भी हल्का हो गया शिकवा शिकायत से
हमारे दिल पे भी रक्खा हुआ पत्थर निकल आया.

वाह ॥बहुत खूब

expression ने कहा…

वाह.....
बहुत बढ़िया.....

अनु

Ashok Khachar ने कहा…

bahut hi khoobsoorat aur shandaar

Rajendra Kumar ने कहा…

बहुत ही सुन्दर शेर.....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वाह ... क्या बात है .. जी हल्का करने की लाजवाब वजह ...
खूबसूरत ...

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

बहुत ख़ूब !

nawal kishore singh ने कहा…

kya baat hai...

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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