समर्थक

रविवार, 21 अप्रैल 2013

वो दूर बैठ के कठपुतलियां नचाते हैं

उबाल खाते हैं फिर बर्फ सा जम जाते हैं.
ये लोग जंगे-मुसलसल कहां चलाते हैं.

हम इंकलाब के नारे बहुत लगाते हैं.
फिर अपने-अपने घरौंदे में लौट आते हैं.

किसी के सामने खुलकर कभी नहीं आते
वो दूर बैठ के कठपुतलियां नचाते हैं.

किसी की शक्ल को पहचानता नहीं कोई
तमाम लोग नक़ाबों में पाये जाते हैं.

अजीब रंग के खा़ना-बदोश हैं हम भी
जहां जगह मिली चादर वहीं बिछाते हैं.

अंधेरे घर पे किसी की नजर नहीं जाती
सब आफताब के आगे दीया जलाते हैं.

नज़र-नवाज़ नजारे नज़र नहीं आते
हमारी आंख के परदे भी झिलमिलाते हैं.

---देवेंद्र गौतम

5 टिप्पणियाँ:

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

अंधेरे घर पे किसी की नजर नहीं जाती
सब आफताब के आगे दीया जलाते हैं.

waah! bahut khoob ....!!

nawal kishore singh ने कहा…

किसी के सामने खुलकर कभी नहीं आते
वो दूर बैठ के कठपुतलियां नचाते हैं.

yahi to hai karporet gharanon kee ranniti...amreeki dadagiri

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अंधेरे घर पे किसी की नजर नहीं जाती
सब आफताब के आगे दीया जलाते हैं ....

वाह ... बहुत ही लाजवाब शेर है ...
कमाल की गज़ल है ...

Ashok Khachar ने कहा…

waaaaaaaaah bhot khub, waaaah

शारदा अरोरा ने कहा…

bahut achchha likha hai..

एक टिप्पणी भेजें

कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

अच्छी-बुरी जो भी हो...प्रतिक्रिया अवश्य दें