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शनिवार, 4 मई 2013

कौन कमबख्त मुस्कुराता है


दर्द को तह-ब-तह सजाता है.
कौन कमबख्त मुस्कुराता है.

और सबलोग बच निकलते हैं
डूबने वाला डूब जाता है.

उसकी हिम्मत तो देखिये साहब!
आंधियों में दिये जलाता है.

शाम ढलने के बाद ये सूरज
अपना चेहरा कहां छुपाता है.

नींद आंखों से दूर होती है
जब भी सपना कोई दिखाता है.

लोग दूरी बना के मिलते हैं
कौन दिल के करीब आता है.

तीन पत्तों को सामने रखकर
कौन तकदीर आजमाता है?

---देवेंद्र गौतम

5 टिप्‍पणियां:

  1. दर्द को तह-ब-तह सजाता है.
    कौन कमबख्त मुस्कुराता है.

    .........lajawaab!

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  2. bahut khoob ghazal kahi hai....bilkul bolchal kee zubaan men...badhai!

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  3. उसकी हिम्मत तो देखिये साहब!
    आंधियों में दिये जलाता है.

    कितना मुख्तलिफ़ अंदाज़ में कहा है अपनी बात को ...
    बहुत ही लाजवाब शेर है देवेन्द्र जी ... पूरी गज़ल पे दाद देने को मन करता है ...

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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