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बुधवार, 1 जुलाई 2015

न काफिलों की चाहतें न गर्द की, गुबार की

न नौसबा की बात है, न ये किसी बयार की
ये दास्तान है नजर पे रौशनी के वार की
किसी को चैन ही नहीं ये क्या अजीब दौर है
तमाम लोग लड़ रहे हैं जंग जीत-हार की
न मंजिलों की जुस्तजू, न हमसफर की आरजू
न काफिलों की चाहतें न गर्द की, गुबार की
जहां तलक है दस्तरस वहीं तलक हैं हासिलें
न कोशिशों की बात है न बात अख्तियार की
हमारे पास तीरगी को चीर के चली किरन
तुम्हारे पास रौशनी तो है मगर उधार की
मुसाफिरों के हौसले पे बर्फ फेरता रहा
कहानियां सुना-सुना के वो नदी की धार की
देवेंद्र गौतम 08527149133 

6 टिप्पणियाँ:

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 2 - 06 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2024 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Neetu Singhal ने कहा…

अलिफ़ बे के वज़ू सिफ़र की गुफ़्तगू किए..,
लगी हुई थी बोलिया ख़सरों पे ख़रीदार की..,

खिलअते- तन में सबकी नियतें खराब थीं..,
ख़ाक उडी शक़्लें थीं ख़िरमने-बाज़ार की..,

रो रहा था जाफ़राँ सिसक रही थी वादियाँ..,
रेज़ा खूँ चप-ओ - राह रूह मिली चनार की.....

राजू : -- ख़िर माने ?

ख़िरमने- बाज़ार = फसलों का बाज़ार
चप-ओ - राह = दाहिने- बाएं

Neetu Singhal ने कहा…


जाँ-निसा को जाँ नहीं किसी को आबोदाँ नहीं..,
उन्हें आरजू थी किसी नफे के कारोबार की..,

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बहुत सुंदर

रश्मि शर्मा ने कहा…

बहुत बढ़ि‍या

Digamber Naswa ने कहा…

बहुत ही कमाल के ... हकीकत बयान करते हैं शेर आपके ...

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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