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बुधवार, 1 जुलाई 2015

न काफिलों की चाहतें न गर्द की, गुबार की

न नौसबा की बात है, न ये किसी बयार की
ये दास्तान है नजर पे रौशनी के वार की
किसी को चैन ही नहीं ये क्या अजीब दौर है
तमाम लोग लड़ रहे हैं जंग जीत-हार की
न मंजिलों की जुस्तजू, न हमसफर की आरजू
न काफिलों की चाहतें न गर्द की, गुबार की
जहां तलक है दस्तरस वहीं तलक हैं हासिलें
न कोशिशों की बात है न बात अख्तियार की
हमारे पास तीरगी को चीर के चली किरन
तुम्हारे पास रौशनी तो है मगर उधार की
मुसाफिरों के हौसले पे बर्फ फेरता रहा
कहानियां सुना-सुना के वो नदी की धार की
देवेंद्र गौतम 08527149133 

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

उसने चाहा था ख़ुदा हो जाए

सबकी नज़रों से जुदा हो जाए.
उसने चाहा था ख़ुदा हो जाए.

चीख उसके निजाम तक पहुंचे
वर्ना गूंगे की सदा हो जाए.

अपनी पहचान साथ रहती है
वक़्त कितना भी बुरा हो जाए.

थक चुके हैं तमाम चारागर
दर्द से कह दो दवा हो जाए.

उसके साए से दूर रहता हूं
क्या पता मुझसे खता हो जाए.

कुछ भला भी जरूर निकलेगा
जितना होना है बुरा हो जाए.

होश उसको कभी नहीं आता
जिसको दौलत का नशा हो जाए.

घर में बच्चा ही कहा जाएगा
चाहे जितना भी बड़ा हो जाए.

-देवेंद्र गौतम


सोमवार, 8 अगस्त 2011

जिसे खोया उसी को.....

(मित्रों ! यह  इस ब्लॉग की 100 वीं पोस्ट है. दो नज्मों और एक कत्ते को छोड़ दें तो अभी तक इसमें ज्यादातर ग़ज़लें ही पोस्ट की गयी हैं. भाई राजेंद्र स्वर्णकार के  इसरार पर जनवरी 2011 में  जब मैंने इस ब्लॉग पर नियमित पोस्ट  डालनी शुरू की तो उस वक़्त तक मात्र 289 पेज व्यूवर थे. सात महीने में आज यह  संख्या 6331 हो चुकी है. फोलोवर भी दूने से ज्यादा बढे हैं. आपलोगों के स्नेह की बदौलत ही यह संभव हुआ है. अब इसमें साहित्य की अन्य विधाओं  का भी समावेश किया जाना चाहिए या इसी रूप में आगे का सफ़र जारी रखना चाहिए इसपर विचार कर रहा हूं. मैं इसपर आपलोगों के विचार भी जानना चाहूंगा. )


जिसे खोया उसी को पा रहा हूं.
गुज़िश्ता वक़्त को दुहरा रहा हूं.

छुपाये दिल में अपनी तिश्नगी को 
समंदर की तरह लहरा रहा हूं.