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बुधवार, 4 मई 2016

हर कोई भागता मिला है मुझे

अपनी रफ़्तार दे गया है मुझे
जब कोई रहनुमा मिला है मुझे
वक़्त के साथ इस ज़माने में
हर कोई भागता मिला है मुझे
उससे मिलने का या बिछड़ने का
कोई शिकवा न अब गिला है मुझे
तजरबे हैं जो खींच लाते हैं
वर्ना अब कौन पूछता है मुझे
क्या बताएगा अब नजूमी भी
‘अपने अंजाम का पता है मुझे’
वैसी सूरत उसे दिखाता हूं
जैसी सूरत में देखता है मुझे
ये जिहालत नहीं अंधेरा है
इस अंधेरे को जीतना है मुझे
अक्स बनकर रहा हूं मैं ‘गौतम’
अपना चेहरा कहां मिला है मुझे
देवेन्द्र गौतम 08527149133

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 05 मई 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 05-95-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2333 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  3. बहुत खूब ... कमाल के शेर हैं इस ग़ज़ल के ...

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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