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सोमवार, 25 जून 2012

हर लंका में एक विभीषण होता है

कुल के अंदर कुल का दुश्मन होता है.
हर लंका में एक विभीषण होता है.

मन का सोना, तन का कुंदन होता है.
हर बूढ़े में थोडा बचपन होता है.

किसको संतुष्टि मिलती है क्या जाने
जब पुरखों का तर्पण-अर्पण होता है .


मन की गहराई की थाह नहीं मिलती
मन के अंदर भी अंतर्मन होता है.

अक्सर अपने हो जाते हैं गैर यहां
अक्सर गैरों में अपनापन होता है।

कुछ लोगों का मिलना रास नहीं आता
कुछ लोगों से मिलने का मन होता है.

इतनी आसानी से टूट नहीं पाता
कच्चे धागों का जो बंधन होता है.

----देवेंद्र गौतम


11 टिप्पणियाँ:

छोटे ने कहा…

इस ग़ज़ल का हर शेर जीवन की एक कडवी सच्चाई को बयां कर रहा है. बहुत-बहुत बधाई!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मन की गहराई की थाह नहीं मिलती
मन के अंदर भी अंतर्मन होता है.

अक्सर अपने हो जाते हैं गैर यहां
अक्सर गैरों में अपनापन होता है।


बहुत बढ़िया ...सच्चाई को कहती खूबसूरत गज़ल

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार २६/६ १२ को राजेश कुमारी द्वारा
चर्चामंच पर की जायेगी

कमल कुमार सिंह (नारद ) ने कहा…

बहुत सुन्दर

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

मन की गहराई की थाह नहीं मिलती
मन के अंदर भी अंतर्मन होता है.

वाह! बहुत उम्दा गजल...
सादर बधाई

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

har sher ko padhkar laga kitni vareeki se padha hai aapne manobhavon ko wakai lajababa...sadar badhayee aaur sadar amantran ke sath

lokendra singh rajput ने कहा…

देवेन्द्र जी सभी शेर बेहद खूबसूरत

veerubhai ने कहा…

रिश्तों में अब आंच नहीं होती ,
रिश्तों में होती पुत्र वधु .

आज के सन्दर्भ में बड़ी सटीक रचना .सच मुच कुछ से मिलके लगता है न मिलता तो दिन अच्छा कट्टा है ,कुछ को देख लगता है जैसे मिलें हों ,मिल लें

veerubhai ने कहा…

कुछ लोगों का मिलना रास नहीं आता
कुछ लोगों से मिलने का मन होता है.
आज के सन्दर्भ में बड़ा खरा बिम्ब है ,सटीक रचना है .सच मुच कुछ से मिलके लगता है न मिलता तो दिन अच्छा कट्टा है ,कुछ को देख लगता है जैसे मिलें हों ,मिल लें

veerubhai ने कहा…

कुछ लोगों का मिलना रास नहीं आता
कुछ लोगों से मिलने का मन होता है.
आज के सन्दर्भ में बड़ा खरा बिम्ब है ,सटीक रचना है .सच मुच कुछ से मिलके लगता है न मिलता तो दिन अच्छा कट्टा है ,कुछ को देख लगता है जैसे मिलें हों ,मिल लें

दिगम्बर नासवा ने कहा…

अक्सर अपने हो जाते हैं गैर यहां
अक्सर गैरों में अपनापन होता है

बहुत खूब ... हर शेर लाजवाब है देवेन्द्र जी ... गज़ल का मतला ही जबरदस्त है तो पूरी गज़ल उसी प्रवाह में बहती जाती है ...

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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