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शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

हुकूमत की चाबी.....

हकीकत यही है
ये हम जानते हैं
कि गोली चलने का कोई इरादा
तुम्हारा नहीं है.
कोई और है जो
तुम्हारे ही कंधे पे बंदूक रखकर
तुम्हीं को निशाना बनाता रहा है.
सभी ये समझते हैं अबतक यहां पर
जो दहशत के सामां दिखाई पड़े हैं
तुम्हीं ने है लाया .
तुम्हीं ने है लाया
मगर दोस्त!
सच क्या है
हम जानते हैं
कि इन सब के पीछे
कहीं तुम नहीं हो.....
फकत चंद जज्बों  के कमजोर धागे
जो उनकी पकड़ में
रहे हैं बराबर .
यही एक जरिया है जिसके  सहारे
अभी तक वो सबको नचाते रहे  हैं
ये तुम जानते हो
ये हम जानते हैं
तुम्हारी ख़ुशी से
तुम्हारे ग़मों से
उन्हें कोई मतलब न था और न होगा
उन्हें सिर्फ अपनी सियासत की मुहरें बिछाकर यहां पर
फकत चाल पर चाल चलनी है जबतक  
हुकूमत की चाबी नहीं हाथ आती
हकीकत यही है
ये तुम जानते हो
ये हम जानते हैं
हमारी मगर एक गुज़ारिश है तुमसे
अगर बात मानो
अभी एक झटके में कंधे से अपने
हटा दो जो बंदूक रखी हुई है
घुमाकर नली उसकी उनकी ही जानिब
घोडा दबा दो
उन्हें ये बता दो
कि कंधे तुम्हारे
हुकूमत लपकने की सीढ़ी नहीं हैं.

--देवेंद्र गौतम

3 टिप्पणियाँ:

Dr. shyam gupta ने कहा…

---धन्यवाद देवेन्द्र जी ....आपका यह गीत पारंपरिक अतुकांत कविता/गीत है .....यह अगीत नहीं है..
---अगीत इसी अतुकांत कविता का रूप है जिसने संक्षिप्तता को अपनाया है, जिसमें ५ से १० पंक्तियों से कम या अधिक नहीं होनी चाहिए..गति,यति लय व प्रवाह होना चाहिए...तुकांत या गेयता आवश्यक नहीं है ..... .... उदाहरणार्थ ..निम्न अगीत देखिये और रचिए... ...

'अर्थहीन सब अर्थ होगये ,
तुम जबसे राहों में खोये |
शब्द छंद रस व्यर्थ होगये,
जब से तुम्हें भुलाया मैंने |
मैंने तुमको भुला दिया है ,
यह तो -कलम यूंही कह बैठी ;
कल जब तुम स्वप्नों में आकर ,
नयनों में आंसू भर लाये ;
छलक उठी थी स्याही मन की |"-ड़ा श्याम गुप्त
---और....
-जन जन की पीड़ा को दूर करें ..।
सोये कोई यहाँ न भूखा
इसका भी ध्यान हमें रखना है,
कोई भी रह न सके प्यासा
इसका अभियान हमें करना है ,
तन मन की विपदा को चूर करें|... ड़ा सत्य

---विस्तृत वर्णन हेतु ब्लॉग "अगीतायन' देखें...

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

बेहतरीन और बिल्कुल सच्ची नज़्म लेकिन आप ने जिन्हें सम्बोधित किया है यदि उन की समझ में ये बात आ जाए तो समस्या का अंत हो जाएगा और वो होना नहीं है क्योंकि
"ग़ैर मुम्किन है कि हालात की गुत्थी सुल्झे
अह्ले दानिश बहुत सोच के उलझाई है"(नामालूम)


फकत चंद जज़्बों के कमज़ोर धागे
जो उनकी पकड़ में
रहे हैं बराबर .
्बस इन्हीं कमज़ोर जज़्बों ,मासूमियत और यक़ीन का फ़ायदा उठा रहे हैं मुट्ठी भर लोग

सदा ने कहा…

वाह ...बेहतरीन

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आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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