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रविवार, 30 सितंबर 2012

अंधी नगरी चौपट राजा

राखे बासी त्यागे ताज़ा.
अंधी नगरी चौपट राजा.

वो देखो लब चाट रहा है
खून मिला है ताज़ा-ताज़ा.

फटे बांस के बोल सुनाये
कोई राग न कोई बाजा.

अंदर-अंदर सुलग रही है
इक चिंगारी, आ! भड़का जा.

बूढा बरगद बोल रहा है
धूप कड़ी है छावं में आ जा.

जाने किस हिकमत से खुलेगा
अपनी किस्मत का दरवाज़ा.

हम और उनके शीशमहल में?
पैदल से पिट जाये राजा?

वक़्त से पहले हो जाता है
वक़्त की करवट का अंदाज़ा.

---देवेंद्र गौतम

6 टिप्पणियाँ:

रविकर ने कहा…

बहुत खूब भाई जी |
शुभकामनायें ||

Asha Saxena ने कहा…

अच्छी लगी यह रचना |आशा

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

अच्छी गज़ल।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूब

nawal kishore singh ने कहा…

हर शेर मौजूदा दौर की विद्रूपताओं को अभिव्यक्त करता हुआ.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (07-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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