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मंगलवार, 14 जून 2011

हमें इस दौर के एक एक लम्हे से.....


हमें इस दौर के एक एक लम्हे से उलझना था.
मगर आखिर कभी तो एक न एक सांचे में ढलना था.

वहीं दोज़ख के शोलों में जलाकर राख कर देता
ख़ुशी का एक भी लम्हा अगर मुझको न देना था.




न पूछो किस तरह गुजरी है अबतक जिंदगी अपनी 
कभी उनसे शिकायत और कभी अपने पे रोना था.

मेरे चारो तरफ थे जाने पहचाने हुए चेहरे 
मगर उस भीड़ से मुझको जरा बचकर निकलना था.

तअल्लुक की किताबों के सभी पन्ने पलटने थे
कई रिश्ते परखने थे, कई चेहरों को पढना था. 

 ----देवेंद्र गौतम 

30 टिप्‍पणियां:

  1. सभी शेर अच्छे .
    मत्ला तो बहुत बढ़िया.
    पढ़कर अच्छा लगा.

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  2. मेरे चारो तरफ थे जाने पहचाने हुए चेहरे
    मगर उस भीड़ से मुझको जरा बचकर निकलना था...

    बहुत ही लाजवाब .. जीवन दर्शन से भरे शेर हैं ... बहुत खूब ...

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  3. बहुत सुन्दर और लाजवाब ग़ज़ल! बधाई!
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

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  4. तअल्लुक की किताबों के सभी पन्ने पलटने थे
    कई रिश्ते परखने थे, कई चेहरों को पढना था.

    हासिले शेर ने मरहम सा लगाया है,
    यूँ तो हमने भी ज़ख्मो को छुआया है...

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  5. सुन्दर अल्फ़ाज़, भाव व गज़ल....

    ---एक न एक = इक न इक ..हो तो गति व लय में रुकावट नहीं होगी...

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  6. तअल्लुक की किताबों के सभी पन्ने पलटने थे
    कई रिश्ते परखने थे, कई चेहरों को पढना था.

    kya bat hai !!!!!!
    bahut khoobsoorat !!!!!

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  7. मेरे चारो तरफ थे जाने पहचाने हुए चेहरे
    मगर उस भीड़ से मुझको जरा बचकर निकलना था.

    बहुत सुन्दर और लाजवाब ग़ज़ल.....

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  8. मेरे चारो तरफ थे जाने पहचाने हुए चेहरे
    मगर उस भीड़ से मुझको जरा बचकर निकलना था.


    Bahut Badhiya....aj daur me sateek hain panktiyan...

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  9. "तअल्लुक की किताबों के सभी पन्ने पलटने थे
    कई रिश्ते परखने थे, कई चेहरों को पढना था."


    और हमारी पूरी जिन्दगी कम पड़ जाती है
    न हम रिश्ते परख पाते हैं और न चेहरे पढ़ पाते हैं....!!

    ***punam***
    bas yun...hi..

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  10. मेरे चारो तरफ थे जाने पहचाने हुए चेहरे
    मगर उस भीड़ से मुझको जरा बचकर निकलना था.


    -वाह, बहुत खूब....

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  11. bahut badhiya...

    kabhi humari gali bhi aaya karo...
    ke humne bhi aapki shaan me mahfil jamaa ke rakhi hai...

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  12. बहुत ही सुन्दर - मन को छूती गजल . अपने में अनूठी.
    आप हिंदी साहित्य को यों ही सम्रद्ध करें , यही कामना है .


    साभार

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  13. 'कई चेहरोँ को पढ़ना था'
    बहुत ख़ूब

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  14. न पूछो किस तरह गुजरी है अबतक जिंदगी अपनी
    कभी उनसे शिकायत और कभी अपने पे रोना था.
    waah, kya baat hai !

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  15. मेरे चारो तरफ थे जाने पहचाने हुए चेहरे
    मगर उस भीड़ से मुझको जरा बचकर निकलना था.
    वाह!

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  16. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच{16-6-2011}

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  17. वाह ... बहुत खूब कहा है ...बेहतरीन ।

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  18. न पूछो किस तरह गुजरी है अबतक जिंदगी अपनी
    कभी उनसे शिकायत और कभी अपने पे रोना था.

    मेरे चारो तरफ थे जाने पहचाने हुए चेहरे
    मगर उस भीड़ से मुझको जरा बचकर निकलना था.


    बहुत खूब ...अच्छी गज़ल

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  19. आपने बहुत सुन्दर शब्दों में अपनी बात कही है।
    बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कहते है आप...शुभकामनायें।

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  20. सादगी के साथ कही गई खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें|

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  21. bahut achhee gazal kahee hai
    ye sher khaas taur par psand aaye ....
    मेरे चारो तरफ थे जाने पहचाने हुए चेहरे
    मगर उस भीड़ से मुझको जरा बचकर निकलना था
    हमें इस दौर के एक एक लम्हे से उलझना था
    मगर आखिर कभी तो एक न एक सांचे में ढलना था

    ekek waali bandish
    kaamyaab bn padee hai !!

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  22. मेरे चारो तरफ थे जाने पहचाने हुए चेहरे
    मगर उस भीड़ से मुझको जरा बचकर निकलना था.

    ....बहुत ख़ूबसूरत गज़ल.

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  23. वहीं दोज़ख के शोलों में जलाकर राख कर देता
    ख़ुशी का एक भी लम्हा अगर मुझको न देना था.

    बहुत सुंदर....

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  24. तअल्लुक की किताबों के सभी पन्ने पलटने थे
    कई रिश्ते परखने थे, कई चेहरों को पढना था.
    बहुत ख़ूबसूरत गज़ल.

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  25. तअल्लुक की किताबों के सभी पन्ने पलटने थे
    कई रिश्ते परखने थे, कई चेहरों को पढना था. bahhut khoobsurat...

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  26. तअल्लुक की किताबों के सभी पन्ने पलटने थे
    कई रिश्ते परखने थे, कई चेहरों को पढना था.

    bahut khoob,gautam bhai.

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कुछ तो कहिये कि लोग कहते हैं
आज ग़ालिब गज़लसरा न हुआ.
---ग़ालिब

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