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रविवार, 19 जून 2011

ताजगी की इक इबारत.......

ताजगी की इक इबारत और क्या.   
मेरी बस इतनी सी चाहत और क्या.

बैठे-बैठे लिख रहा होगा खुदा
हम सभी लोगों की किस्मत और क्या.


मंगलवार, 14 जून 2011

हमें इस दौर के एक एक लम्हे से.....


हमें इस दौर के एक एक लम्हे से उलझना था.
मगर आखिर कभी तो एक न एक सांचे में ढलना था.

वहीं दोज़ख के शोलों में जलाकर राख कर देता
ख़ुशी का एक भी लम्हा अगर मुझको न देना था.


सिलसिला रुक जाये शायद.....

सिलसिला रुक जाये शायद आपसी तकरार का.
रुख अगर हम मोड़ दें बहती नदी की धार का.

जब तलक सर पे हमारे छत सियासत की रहेगी
टूटना मुमकिन नहीं होगा किसी दीवार का.

मार्क्स, गांधी, लोहिया, सुकरात, रूसो, काफ्का
सबपे भारी पड़ रहा है फलसफा बाज़ार का.


ज़मीं की खाक में......

ज़मीं की खाक में देखा गया है.
परिंदा जो बहुत ऊंचा उड़ा है.

हवा का काफिला ठहरा हुआ है.
फ़ज़ा के सर पे सन्नाटा जड़ा है.

मरासिम टूटने के बाद अक्सर
तआल्लुक और भी गहरा हुआ है.


रेज़ा-रेज़ा बिखर रहे हैं हम.

रेज़ा-रेज़ा बिखर रहे हैं हम.
अब तो हद से गुज़र रहे हैं हम.

एक छोटे से घर की हसरत में
मुद्दतों दर-ब-दर रहे हैं हम.


गुरुवार, 9 जून 2011

क्या ढोते बेकार के रिश्ते.

("OBO लाइव महा उत्सव" अंक ८...में प्रस्तुत)

तोड़ दिए संसार के रिश्ते. 
क्या ढोते बेकार के रिश्ते.

स्वर्ग-नर्क के बीच मिलेंगे 
इस पापी संसार के रिश्ते.

रोज तराजू में तुलते हैं
बस्ती और बाज़ार के रिश्ते.


शनिवार, 4 जून 2011

हवा में उड़ रहा है आशियाना

हवा में उड़ रहा है आशियाना.
परिंदे का नहीं कोई ठिकाना.

हमेशा चूक हो जाती है हमसे
सही लगता नहीं कोई निशाना.

अभी सहरा में लाना है समंदर
अभी पत्थर पे है सब्ज़ा उगाना.

जिसे आंखों ने देखा सच वही है
किसी की बात में बिल्कुल न आना.

मंगलवार, 31 मई 2011

जरा सी जिद ने इस आंगन का.......

(यह ग़ज़ल 28 से 30 मई तक openbooksonline.com पर आयोजित obo लाइव तरही मुशायरा, अंक-11 के लिए कही थी. तरह थी-'जरा सी जिद ने इस आंगन का बंटवारा कराया है.' काफिया-आ, रदीफ़-कराया है.)

समंदर और सुनामी का कभी रिश्ता कराया है?  
कभी सहरा ने गहराई का अंदाज़ा कराया है?

न जाने कौन है जिसने यहां बलवा कराया है.
हमारी मौत का खुद हमसे ही सौदा कराया है.

फकत इंसान का इंसान से झगड़ा कराया है.
बता देते हैं हम कि आपने क्या-क्या कराया है. 


मंगलवार, 24 मई 2011

डूबने वाले को......

डूबने वाले को तिनके के सहारे थे बहुत.
एक दरिया था यहां जिसके किनारे थे बहुत.

एक तारा मैं भी रख लेता तो क्या जाता तेरा
आस्मां वाले तेरे दामन में तारे थे बहुत.

वक़्त की दीवार से इक रोज  रुखसत हो गयी
हमने जिस तसवीर के सदके उतारे थे बहुत.


मंगलवार, 17 मई 2011

कहीं सूरज, कहीं जुगनू का......

कहीं सूरज, कहीं जुगनू का अलम रख देना.
अंधेरे घर में उजाले का भरम रख देना.

बैठकर सुर्खियां गढ़ने से भला  क्या हासिल
झूठ लिखने से तो बेहतर है कलम रख देना.


मंगलवार, 10 मई 2011

हिसारे-जां में सिमटा हूं मैं अब......

हिसारे-जां में सिमटा हूं मैं अब सबसे जुदा होकर.
दिशाएं दूर बैठी हैं बहुत मुझसे खफा होकर.

ये मेरी वज्जादारी है निभा लेता हूं रिश्ते को 
वगर्ना क्या करोगे तुम भला मुझसे खफा होकर.


मंगलवार, 3 मई 2011

पुरानी नस्लों से.......

सुर्ख और ज़र्द लम्हों की कश्मकश ने 
जब-जब 
तुम्हारे वजूद की ऊंची इमारत  को 
बेरब्त खंडरों में तब्दील किया 
और जब-जब
तुम्हारे चेहरे पर 
आड़ी-तिरछी रेखाओं की सल्तनत कायम हुई 
तुम हमारे करीब आये....

तुम हमारे करीब आये
और 
अपने कांपते हुए हाथों से 
एक बोसीदा सी गठरी 
हमारे कंधों पर रखकर 
मुतमईन हो गए....


तुमने कहा-
इसमें वो लालो-गुहर हैं 
जिनकी रौशनी 
अबतक हमारी रहनुमाई करती आई है 
अब....अब तुम्हारे काम आएगी....

सदियां गुज़र गयीं......
हम-तुम 
न जाने कितनी बार मिले 
और...न जाने कितनी बार हमने 
तुम्हारे हुक्म की तामील की.

लेकिन धीरे-धीरे....
तुम्हारे लालो-गुहर 
तुम्हारे हीरे-जवाहरात 
खुरदुरे पत्थरों की शक्ल अख्तियार करने लगे
और हर पत्थर पे सब्त होती गयी
गुलामी की एक लंबी सी दास्तां....
अब तो...
इस बोसीदा गठरी से 
बदबू भी आने लगी है.

इसीलिए इसबार हमने   
अपने हाथों में उठा ली है             
एक जलती हुई मशाल  
और इसी मशाल की रौशनी के सहारे हमने 
अंधेरों की तिलस्मी सियासत के खिलाफ 
बगावत का नारा बुलंद किया है.

मुमकिन हो तो तुम भी 
पुरानी अजमतों के बोझ को  ताक पर रख दो 
और हमारी मशाल की रौशनी के लिए
अपना लहू दो......
अपना..... लहू..... दो....!

----देवेन्द्र गौतम 

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

ज़रूरत हर किसी की.....

ज़रूरत हर किसी की हर किसी के सामने लाना.
नदी सूखे तो दरिया को नदी के सामने लाना.

अंधेरे और उजाले का खुले कुछ भेद हमपर भी 
अगर नेकी मिले तुमको बदी के सामने लाना.


गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

ज़मीं बदली, फलक बदला.....

"ज़मीं बदली, फलक बदला, निज़ामे-दो-जहां  बदला".
मगर जिसको बदलना था अभी तक वो कहां बदला.

गली बदली, नगर बदला, मकीं बदले, मकां बदला.
बस इक लम्हे की करवट से शबिस्ताने-जहां बदला.

वही लहजा पुराना सा, वही आदम, वही हव्वा 
न अपनी दास्तां बदली, न अंदाज़े-बयां बदला.


रविवार, 17 अप्रैल 2011

अजीब ख्वाहिशों का ज़लज़ला है....

अजीब ख्वाहिशों का ज़लज़ला है घर-घर में.
किसी के पांव सिमटते नहीं हैं चादर में.

मैं ऐसा अब्र के जो आजतक भटकता हूं
वो एक नदी थी के जो मिल गयी समंदर में.


शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

ख्वाबों की धुंध में अभी.......

ख्वाबों की धुंध में अभी रूपोश हैं सभी.
आंखें खुली हुई हैं प बेहोश हैं सभी.

तेरे असर से चार-सू रहता था शोरगुल
टूटा तेरा तिलिस्म तो खामोश हैं सभी.


सोमवार, 11 अप्रैल 2011

दिलों में तैरती कागज़ की नाव.....

दिलों में तैरती कागज़ की नाव तो देखो. 
नदी तो देखो, नदी का बहाव तो देखो.

मैं कौन हूं मेरे नज़दीक आओ तो देखो.
तुम अपने आप को मुझमें छुपाओ तो देखो.

ज़मीन पांव तले है न आस्मां सर पर
नज़र की धुंध को लेकिन हटाओ तो देखो. 


शनिवार, 9 अप्रैल 2011

एक कत्ता

(जंतर-मंतर के नाम)

दो कदम पीछे हटे हैं वो अभी 
एक कदम आगे निकलने के लिए.
ये सियासत का ही एक अंदाज़ है 
झुक गए हैं और तनने के लिए.

-----देवेंद्र गौतम 

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

ज़मीं से दूर..बहुत दूर....

ज़मीं से दूर..बहुत दूर..आसमान में है.
मेरे जुनूं का परिंदा अभी उड़ान में है.

कहां से लायें अंधेरों से जूझने का रसूख
हमारे वक़्त का सूरज अभी ढलान में है.


वटवृक्ष: गज़ल

रश्मि प्रभा जी ने गज़लगंगा की एक ग़ज़ल अपने चर्चित ब्लॉग  वटवृक्ष में पोस्ट की. उन्हें हार्दिक धन्यवाद! उनका ब्लॉग देखने के लिए नीचे क्लिक करें--

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

दर्दो-गम का इक समंदर.....

दर्दो-गम का इक समंदर रख लिया है.
हमने अपने दिल पे पत्थर रख लिया है.

चैन की इक सांस के बदले में हमने
अपने अंदर इक बवंडर रख लिया है.

अजमतों का बोझ कांधे से हटाकर
हमने अपने सर के ऊपर रख लिया है.