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रविवार, 1 जुलाई 2012

पूरा करें तो कैसे करें दास्तान को

पूरा करें तो कैसे करें दास्तान को.
हर पल बदल रहे हैं वो अपने बयान  को.

इस घर की कहानी भी अजीबो-गरीब है
मेहमां बना के रख दिया है मेज़बान को.

सोमवार, 25 जून 2012

हर लंका में एक विभीषण होता है

कुल के अंदर कुल का दुश्मन होता है.
हर लंका में एक विभीषण होता है.

मन का सोना, तन का कुंदन होता है.
हर बूढ़े में थोडा बचपन होता है.

किसको संतुष्टि मिलती है क्या जाने
जब पुरखों का तर्पण-अर्पण होता है .

रविवार, 17 जून 2012

रिश्तों की पहचान अधूरी होती है

रिश्तों की पहचान अधूरी होती है.
जितनी कुर्बत उतनी दूरी होती है.

पहले खुली हवा में पौधे उगते थे
अब बरगद की छांव जरूरी होती है.

मंगलवार, 12 जून 2012

एक कत्ता


कुछ भी दामन में कम नहीं रहता.
मैं कभी चश्मे-नम नहीं रहता.
एक पल को ख़ुशी मिली होती
फिर मुझे कोई गम नहीं रहता.

----देवेंद्र गौतम 

सोमवार, 4 जून 2012

मुखालिफ हवाओं को हमवार कर दे.

मुखालिफ हवाओं को हमवार कर दे.
भवंर में फंसा हूं मुझे पार कर दे.

जिसे जिंदगी ने कहीं का न छोड़ा
उसे जिंदगी का तलबगार कर दे.

शनिवार, 26 मई 2012

कौन किसकी पुकार पर आया

कौन किसकी पुकार पर आया.
जो भी आया करार पर आया.

तेज़ रफ़्तार कार पर आया.
कौन गर्दो-गुबार पर आया?

सबकी गर्दन को काटने वाला 
आज चाकू की धार पर आया.

गुरुवार, 17 मई 2012

रास्ते में कहीं उतर जाऊं?

रास्ते में कहीं उतर जाऊं?
 घर से निकला तो हूं, किधर जाऊं?

पेड़ की छांव में ठहर जाऊं?
धूप ढल जाये तो मैं घर जाऊं?

शनिवार, 5 मई 2012

जाने किस-किस की आस होता है

जाने किस-किस की आस होता है.
जिसका चेहरा उदास होता है.

उसकी उरियानगी पे मत जाओ
अपना-अपना लिबास होता है.

एक पत्ते के टूट जाने पर
पेड़ कितना उदास होता है.

शनिवार, 28 अप्रैल 2012

मेरी बर्बादियों का गम न करना

मेरी बर्बादियों का गम न करना.
तुम अपनी आंख हरगिज़ नम न करना.

हमेशा एक हो फितरत तुम्हारी
कभी शोला कभी शबनम न करना.

कई तूफ़ान रस्ते में मिलेंगे
तुम अपने हौसले मद्धम न करना.

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

ऐसी सूरत चांदनी की

ऐसी सूरत चांदनी की.
नींद उड़ जाये सभी की.

एक लम्हा जानते हैं
बात करते हैं सदी की.

हम किनारे जा लगेंगे
धार बदलेगी नदी की.

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

बंद दरवाज़े को दस्तक दे रहा था

जाने किस उम्मीद के दर पे खड़ा था.
बंद दरवाज़े को दस्तक दे रहा था.

कोई मंजिल थी, न कोई रास्ता था
उम्र भर  यूं ही   भटकता फिर रहा था.

वो सितारों का चलन बतला रहे थे
मैं हथेली की लकीरों से खफा था.

गुरुवार, 29 मार्च 2012

खता क्या है मेरी इतना बता दे


खता क्या है मेरी इतना बता दे.
फिर इसके बाद जो चाहे सजा दे.

अगर जिन्दा हूं तो जीने दे मुझको
अगर मुर्दा हूं तो कांधा लगा दे.

हरेक जानिब है चट्टानों का घेरा
निकलने का कोई तो रास्ता दे.

गुरुवार, 22 मार्च 2012

आदमी के भेष में शैतान था


आदमी के भेष में शैतान था.
हम समझते थे कि वो भगवान था.

एक-इक अक्षर का उसको ज्ञान था.
उसके घर में वेद था, कुरआन था.

सख्त था बाहर की दुनिया का सफ़र
घर की चौखट लांघना आसान था.

गुरुवार, 15 मार्च 2012

एक कत्ता


(एक ऐसे बच्चे के नाम जिसे छः माह पहले उसकी मां एक नर्सिंग होम में जन्म देकर फरार हो गयी थी और जो बहुरूपिया ब्लॉग के संचालक पवन श्रीवास्तव के घर पर पल रहा है. पवन जी के भाई अशोक मानव ने उसे गोद लिया है.)


अपने पाओं पे खड़ा होने दो.
घर का बच्चा है, बड़ा होने दो.
प्यास दुनिया की ये बुझाएगा
कच्ची मिटटी है घड़ा होने दो.

------देवेंद्र गौतम

गुरुवार, 8 मार्च 2012

सिलसिले इस पार से उस पार थे

सिलसिले इस पार से उस पार थे.
हम नदी थे या नदी की धार थे?

क्या हवेली की बुलंदी ढूंढ़ते
हम सभी ढहती हुई दीवार थे.

उसके चेहरे पर मुखौटे थे बहुत
मेरे अंदर भी कई किरदार थे.

मैं अकेला तो नहीं था शह्र में
मेरे जैसे और भी दो-चार थे.

खौफ दरिया का न तूफानों का था
नाव के अंदर कई पतवार थे.

तुम इबारत थे पुराने दौर के
हम बदलते वक़्त के अखबार थे.

-----देवेंद्र गौतम

 



शनिवार, 14 जनवरी 2012

खून में डूबे हुए थे रास्ते सब इस नगर के

खून में डूबे हुए थे रास्ते सब इस नगर के.
हम जो गलियों में छुपे थे, घाट के थे और न घर के.

ठीक था सबकुछ यहां तो लोग अपनी हांकते थे
खतरा मंडराने लगा तो चल दिए इक-एक कर के.

हादिसा जब कोई गुज़रा या लुटा जब चैन दिल का
मैनें समझा कोई रावण ले गया सीता को हर के.

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

नज़र के सामने जो कुछ है अब सिमट जाये

ग़मों की धुंध जो छाई हुई है छंट जाये.
कुछ ऐसे ख्वाब दिखाओ कि रात कट जाये.

नज़र के सामने जो कुछ भी है सिमट जाये.
गर आसमान न टूटे, ज़मीं ही फट जाये.


गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

तमन्नाओं की नगरी को कहीं फिर से बसा लूंगा

तमन्नाओं की नगरी को कहीं फिर से बसा लूंगा.
यही दस्तूरे-दुनिया है तो खुद को बेच डालूंगा.

तुझे खंदक में जाने से मैं रोकूंगा नहीं लेकिन
जहां तक तू संभल पाए वहां तक तो संभालूंगा.


उसे मैं ढूंढ़ लाऊंगा जहां भी छुप के बैठा हो
मैं हर सहरा को छानूंगा, समंदर को खंगालूंगा

 दिखाऊंगा कि कैसे आस्मां  में छेद होता है
मैं एक पत्थर तबीयत से हवाओं में उछालूंगा .

मिलेगी कामयाबी हर कदम पर देखना गौतम
खुदा का  खौफ मैं जिस रोज भी दिल से निकालूंगा.

----देवेंद्र गौतम



शनिवार, 19 नवंबर 2011

अपनी-अपनी जिद पे अड़े थे

अपनी-अपनी जिद पे अड़े थे.
इसीलिए हम-मिल न सके थे.

एक अजायब घर था, जिसमें
कुछ अंधे थे, कुछ बहरे थे.


बुधवार, 9 नवंबर 2011

अब नहीं सूरते-हालात बदलने वाली.

अब नहीं सूरते-हालात बदलने वाली.
फिर घनी हो गयी जो रात थी ढलने वाली.

अपने अहसास को शोलों से बचाते क्यों हो
कागज़ी वक़्त की हर चीज है जलने वाली . 


शनिवार, 5 नवंबर 2011

बेबसी चारो तरफ फैली रही

बेबसी चारो तरफ फैली रही.
जिंदगी फिर भी सफ़र करती रही.

अब इसे खुलकर बिखरने दे जरा
रौशनी सदियों तलक सिमटी रही.

रात के अंतिम पहर पे देर तक
सुब्ह की पहली किरन हंसती रही.