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सोमवार, 10 सितंबर 2012

हमने रिश्ता बहाल रखा था

एक सांचे में ढाल रखा था.
हमने सबको संभाल रखा था.

एक सिक्का उछाल रखा था.
और अपना सवाल रखा था.

सबको हैरत में डाल रखा था.
उसने ऐसा कमाल रखा था.

कुछ बलाओं को टाल रखा था.
कुछ बलाओं को पाल रखा था.

हर किसी पर निगाह थी उसकी
उसने सबका ख़याल रखा था.

गीत के बोल ही नदारत थे
सुर सजाये थे, ताल रखा था.

उसके क़दमों में लडखडाहट थी
उसके घर में बवाल रखा था.

उसकी दहलीज़ की रवायत थी
हमने सर पर रुमाल रखा था.

साथ तुम ही निभा नहीं पाए
हमने रिश्ता बहाल रखा था.

-देवेंद्र गौतम

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

चांद निकला भी नहीं था और सूरज ढल गया.

एक लम्हा जिंदगी का आते-आते टल गया.
चांद निकला भी नहीं था और सूरज ढल गया.

अब हवा चंदन की खुश्बू की तलब करती रहे
जिसको जलना था यहां पर सादगी से जल गया.

धीरे-धीरे वक़्त ने चेहरे की रौनक छीन ली
होंठ से सुर्खी गयी और आंख से काजल गया.

आज मैं जैसा भी हूं तेरा करम है और क्या
तूने जिस सांचे में ढाला मैं उसी में ढल गया.

फिर उसूलों की किताबें किसलिए पढ़ते हैं हम
जिसको जब मौक़ा मिला इक दूसरे को छल गया.

अपना साया तक नहीं था, साथ जो देता मेरा
धूप में घर से निकलना आज मुझको खल गया.

बारहा हारी हुई बाज़ी भी उसने जीत ली
चलते-चलते यक-ब-यक कुछ चाल ऐसी चल गया.

---देवेंद्र गौतम

बुधवार, 29 अगस्त 2012

कोयले की खान में दबकर रहा हीरा बहुत.


हर किसी की आंख में फिर क्यों नहीं चुभता बहुत.
कोयले की खान में दबकर रहा हीरा बहुत.

इसलिए मैं धीरे-धीरे सीढियां चढ़ता रहा
पंख कट जाते यहां पर मैं अगर उड़ता बहुत.

ज़िन्दगी इकबार भटकी तो भटकती ही गयी
सबने समझाया बहुत समझा मगर थोडा बहुत.

रात भर बिस्तर पे कोई करवटें लेता रहा
रातभर रोता रहा बिल्ली का एक बच्चा बहुत.

कुछ बताओ तो सही ये रोग कब मुझको लगा
मैं किसी की याद में कबतक रहा खोया बहुत.

वो किसी मजबूत कंधे की सवारी कर रहा है
वरना उसका इस कदर जमता नहीं सिक्का बहुत.

फिर अचानक धूप की किरनें ज़मीं पर आ गयीं
फिर अचानक चांद का चेहरा हुआ फीका बहुत.

हम तवज़्ज़ो दें न दें क्या फर्क पड़ता है उसे
उसकी फितरत है कि वो सुनता है कम, कहता बहुत.

---देवेंद्र गौतम

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

आखरी सांस बचाकर रखना

एक उम्मीद लगाकर रखना.
दिल में कंदील जलाकर रखना.

कुछ अकीदत तो बचाकर रखना.
फूल थाली में सजाकर रखना.

जिंदगी साथ दे भी सकती है
आखरी सांस बचाकर रखना.

पास कोई न फटकने पाए
धूल रस्ते में उड़ाकर रखना.

ये इबादत नहीं गुलामी है
शीष हर वक़्त झुकाकर रखना.

लफ्ज़ थोड़े, बयान सदियों का
जैसे इक बूंद में सागर रखना.

भीड़ से फर्क कुछ नहीं पड़ता
अपनी पहचान बचाकर रखना

----देवेंद्र गौतम


शनिवार, 18 अगस्त 2012

तुम उसकी गर्दन नहीं नाप सकते


(पूर्वोत्तर की भगदड़ पर)

ये भगदड़ मचाई है जिस भी किसी ने
उसे ये पता है
कि तुम उसकी गर्दन नहीं नाप सकते
कि अब तुममे पहली सी कुव्वत नहीं है
कभी हाथ इतने थे लंबे तुम्हारे
कि उड़ते परिंदों के पर गिन रहे थे
कोई सात पर्दों में चाहे छुपा हो
पकड़ कर दिखाते थे
पिंजड़े का रस्ता
मगर अब वो दमखम
कहीं भी नहीं है
कि अब आस्मां क्या
ज़मीं तक
तुम्हारी पकड़ में नहीं है
वो चलती हुई ट्रेन से लोग फेंके गए तो
कहो तुम कहां थे
कहां थी तुम्हारी
सुरक्षा व्यवस्था
तुम्हीं अब बता दो
कि तुम पर भरोसा करे भी अगर तो
 करे कोई कैसे....

---देवेंद्र गौतम

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

हुकूमत की चाबी.....

हकीकत यही है
ये हम जानते हैं
कि गोली चलने का कोई इरादा
तुम्हारा नहीं है.
कोई और है जो
तुम्हारे ही कंधे पे बंदूक रखकर
तुम्हीं को निशाना बनाता रहा है.
सभी ये समझते हैं अबतक यहां पर
जो दहशत के सामां दिखाई पड़े हैं
तुम्हीं ने है लाया .
तुम्हीं ने है लाया
मगर दोस्त!
सच क्या है
हम जानते हैं
कि इन सब के पीछे
कहीं तुम नहीं हो.....
फकत चंद जज्बों  के कमजोर धागे
जो उनकी पकड़ में
रहे हैं बराबर .
यही एक जरिया है जिसके  सहारे
अभी तक वो सबको नचाते रहे  हैं
ये तुम जानते हो
ये हम जानते हैं
तुम्हारी ख़ुशी से
तुम्हारे ग़मों से
उन्हें कोई मतलब न था और न होगा
उन्हें सिर्फ अपनी सियासत की मुहरें बिछाकर यहां पर
फकत चाल पर चाल चलनी है जबतक  
हुकूमत की चाबी नहीं हाथ आती
हकीकत यही है
ये तुम जानते हो
ये हम जानते हैं
हमारी मगर एक गुज़ारिश है तुमसे
अगर बात मानो
अभी एक झटके में कंधे से अपने
हटा दो जो बंदूक रखी हुई है
घुमाकर नली उसकी उनकी ही जानिब
घोडा दबा दो
उन्हें ये बता दो
कि कंधे तुम्हारे
हुकूमत लपकने की सीढ़ी नहीं हैं.

--देवेंद्र गौतम

सोमवार, 13 अगस्त 2012

कुछ नया हो तो सही

जलजला हो तो सही.
कुछ नया हो तो सही.

कुछ बुरा होने से पहले
कुछ भला हो तो सही.

दो के मिलने का नतीजा
तीसरा हो तो सही.

रोक लेंगे सब उड़ानें
पर कटा हो तो सही.

एक चुल्लू भी बहुत है
डूबना हो तो तो सही.

क्या छुपायें, क्या बताएं
कुछ पता हो तो सही.

हम लुटाने को लुटा दें
कुछ बचा हो तो सही.

मंजिलें मिल जायेंगी
रास्ता हो तो सही.

बांटने को बांट लेंगे
कुछ मिला हो तो सही.

फिर परिन्दें आ बसेंगे
घोंसला  हो तो सही.

थोड़ी खुशबू मांग लेंगे
गुल खिला हो तो सही.

मानता हूं घर बड़ा है
दिल बड़ा हो तो सही.

मिलने जुलने का भी कोई
सिलसिला हो तो सही.

इक नज़र में नाप लेंगे
सामना हो तो सही.

जिन्दगी आमद करेगी
बुलबुला हो तो सही.

अपने अंदर झांकने की
भावना हो तो सही.

आस्मां छोटा पड़ेगा
कद बड़ा हो तो सही.

हर जगह मौजूद है
उसको चाहो तो सही.

आज के बच्चों में थोडा
बचपना हो तो सही.

फिर कोई बैजू यहां पर
बावरा हो तो सही.

हम सभी देंगे शहादत
कर्बला हो तो सही.

क्या भला है क्या बुरा
फैसला हो तो सही.

हाशिये में हम रहेंगे
हाशिया हो तो सही.

मांग लायेंगे खुदाई
पर खुदा हो तो सही.

इंद्र का दरबार कर दें
अप्सरा हो तो सही.

और बढ़ जाएगी कुर्बत
फासला हो तो सही.

---देवेंद्र गौतम

शनिवार, 4 अगस्त 2012

लोकतंत्र का मर्सिया

तुमने कहा-
अब एक घाट पर पानी पीयेंगे
बकरी और बघेरे

इसी भ्रम में हलाल होती रहीं बकरियां
तृप्त होते रहे बघेरे.

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

हमने दुनिया देखी है

भूल-भुलैया देखी है.
हमने दुनिया देखी है.

उतने की ही बात करो
जितनी दुनिया देखी है.

हमने झिलमिल पानी में
अपनी काया देखी है.

बुधवार, 25 जुलाई 2012

हमसफ़र कोई न था फिर भी सफ़र करता रहा

अपनी सारी ख्वाहिशों को दर-ब-दर करता रहा.
हमसफ़र कोई न था फिर भी सफ़र करता रहा.

एक तुम जिसको किसी पर भी नहीं आया यकीं
एक मैं जो हर किसी को मोतबर करता रहा.

बेघरी ने तोड़ डाला था उसे अंदर  तलक
इसलिए वो हर किसी के दिल में घर करता रहा .

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

रखते हैं लोग जिल्द में दिल की किताब को

कांटों से भरी शाख पर खिलते गुलाब को.
हमने क़ुबूल कर लिया कैसे अज़ाब को.

दिल की नदी में टूटते बनते हुबाब को.
देखा नहीं किसी ने मेरे इज़्तराब को.

चेहरों से झांकते नहीं जज़्बात आजकल
रखते हैं लोग जिल्द में दिल की किताब को.

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

बाधा दौड़


बंद आंखों के सामने है
अतृप्त इच्छाओं का एक कब्रिस्तान......
हर कब्र से उभरती हैं
तरह-तरह की आकृतियां

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

देवता जितने भी थे पत्थर के थे

कुछ ज़मीं के और कुछ अम्बर के थे.
अक्स  सारे  डूबते  मंज़र  के  थे.

कुछ इबादत का सिला मिलता न था
देवता जितने भी थे पत्थर के थे.

दिल में कुछ, होठों पे कुछ, चेहरे पे कुछ
किस कदर मक्कार हम अंदर के थे.

रविवार, 1 जुलाई 2012

पूरा करें तो कैसे करें दास्तान को

पूरा करें तो कैसे करें दास्तान को.
हर पल बदल रहे हैं वो अपने बयान  को.

इस घर की कहानी भी अजीबो-गरीब है
मेहमां बना के रख दिया है मेज़बान को.

सोमवार, 25 जून 2012

हर लंका में एक विभीषण होता है

कुल के अंदर कुल का दुश्मन होता है.
हर लंका में एक विभीषण होता है.

मन का सोना, तन का कुंदन होता है.
हर बूढ़े में थोडा बचपन होता है.

किसको संतुष्टि मिलती है क्या जाने
जब पुरखों का तर्पण-अर्पण होता है .

रविवार, 17 जून 2012

रिश्तों की पहचान अधूरी होती है

रिश्तों की पहचान अधूरी होती है.
जितनी कुर्बत उतनी दूरी होती है.

पहले खुली हवा में पौधे उगते थे
अब बरगद की छांव जरूरी होती है.

मंगलवार, 12 जून 2012

एक कत्ता


कुछ भी दामन में कम नहीं रहता.
मैं कभी चश्मे-नम नहीं रहता.
एक पल को ख़ुशी मिली होती
फिर मुझे कोई गम नहीं रहता.

----देवेंद्र गौतम 

सोमवार, 4 जून 2012

मुखालिफ हवाओं को हमवार कर दे.

मुखालिफ हवाओं को हमवार कर दे.
भवंर में फंसा हूं मुझे पार कर दे.

जिसे जिंदगी ने कहीं का न छोड़ा
उसे जिंदगी का तलबगार कर दे.

शनिवार, 26 मई 2012

कौन किसकी पुकार पर आया

कौन किसकी पुकार पर आया.
जो भी आया करार पर आया.

तेज़ रफ़्तार कार पर आया.
कौन गर्दो-गुबार पर आया?

सबकी गर्दन को काटने वाला 
आज चाकू की धार पर आया.

गुरुवार, 17 मई 2012

रास्ते में कहीं उतर जाऊं?

रास्ते में कहीं उतर जाऊं?
 घर से निकला तो हूं, किधर जाऊं?

पेड़ की छांव में ठहर जाऊं?
धूप ढल जाये तो मैं घर जाऊं?

शनिवार, 5 मई 2012

जाने किस-किस की आस होता है

जाने किस-किस की आस होता है.
जिसका चेहरा उदास होता है.

उसकी उरियानगी पे मत जाओ
अपना-अपना लिबास होता है.

एक पत्ते के टूट जाने पर
पेड़ कितना उदास होता है.