समर्थक

बुधवार, 9 नवंबर 2011

अब नहीं सूरते-हालात बदलने वाली.

अब नहीं सूरते-हालात बदलने वाली.
फिर घनी हो गयी जो रात थी ढलने वाली.

अपने अहसास को शोलों से बचाते क्यों हो
कागज़ी वक़्त की हर चीज है जलने वाली . 


शनिवार, 5 नवंबर 2011

बेबसी चारो तरफ फैली रही

बेबसी चारो तरफ फैली रही.
जिंदगी फिर भी सफ़र करती रही.

अब इसे खुलकर बिखरने दे जरा
रौशनी सदियों तलक सिमटी रही.

रात के अंतिम पहर पे देर तक
सुब्ह की पहली किरन हंसती रही.

बुधवार, 17 अगस्त 2011

हर लम्हा जो करीब था........

हर लम्हा जो करीब था वो बदगुमां मिला.
उजड़ा हुआ ख़ुलूस ही हरसू रवां मिला.

सर पे किसी भी साये की हसरत नहीं रही
मुझपे गिरा है टूट के जो आस्मां मिला.

सोमवार, 8 अगस्त 2011

जिसे खोया उसी को.....

(मित्रों ! यह  इस ब्लॉग की 100 वीं पोस्ट है. दो नज्मों और एक कत्ते को छोड़ दें तो अभी तक इसमें ज्यादातर ग़ज़लें ही पोस्ट की गयी हैं. भाई राजेंद्र स्वर्णकार के  इसरार पर जनवरी 2011 में  जब मैंने इस ब्लॉग पर नियमित पोस्ट  डालनी शुरू की तो उस वक़्त तक मात्र 289 पेज व्यूवर थे. सात महीने में आज यह  संख्या 6331 हो चुकी है. फोलोवर भी दूने से ज्यादा बढे हैं. आपलोगों के स्नेह की बदौलत ही यह संभव हुआ है. अब इसमें साहित्य की अन्य विधाओं  का भी समावेश किया जाना चाहिए या इसी रूप में आगे का सफ़र जारी रखना चाहिए इसपर विचार कर रहा हूं. मैं इसपर आपलोगों के विचार भी जानना चाहूंगा. )


जिसे खोया उसी को पा रहा हूं.
गुज़िश्ता वक़्त को दुहरा रहा हूं.

छुपाये दिल में अपनी तिश्नगी को 
समंदर की तरह लहरा रहा हूं.

सोमवार, 1 अगस्त 2011

हर वक़्त कोई रंग हवा में.......

हर वक़्त कोई रंग हवा में उछाल रख.
दुनिया के सामने युहीं अपना कमाल रख.

अपनी अकीदतों का जरा सा खयाल रख.
आना है मेरे दर पे तो सर पे रुमाल रख.

मैं डूबता हूं और उभरता हूं खुद-ब-खुद 
तू मेरी फिक्र छोड़ दे अपना खयाल रख.


रविवार, 24 जुलाई 2011

खुदी के हाथ से निकला........

खुदी के हाथ से निकला तो फिर हलाक हुआ.
कफे-गुरूर में हर शख्स जेरे-खाक हुआ.

हरेक तर्ह की आबो-हवा से गुजरा हूं
ये और बात तेरी रहगुजर में खाक हुआ.


शनिवार, 16 जुलाई 2011

इन्हीं सड़कों से रगबत थी......

इन्हीं सड़कों से रग़बत थी, इन्हीं गलियों में डेरा था.
यही वो शह्र है जिसमें कभी अपना बसेरा था.

सफ़र में हम जहां ठहरे तो पिछला वक़्त याद आया
यहां तारीकिये-शब है वहां रौशन सबेरा था.

वहां जलती मशालें भी कहां तक काम आ पातीं 
जहां हरसू खमोशी  थी, जहां हरसू अंधेरा था.

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

लाख हमसाये मिले हैं......


लाख हमसाये मिले हैं आईनों के दर्मियां.
अजनवी बनकर रहा हूं दोस्तों के दर्मियां.

काफिले ही काफिले थे हर तरफ फैले हुए
रास्ते ही रास्ते थे मंजिलों के दर्मियां.


शनिवार, 2 जुलाई 2011

खेल-तमाशे दिखा रहा है......

खेल-तमाशे दिखा रहा है यारब क्या.
हम धरती वालों से तुझको मतलब क्या.

कुछ परदे के पीछे है कुछ परदे पर 
उसे पता है दिखलाना है कब-कब क्या.

प्यार से जीना प्यार से मरना है प्यारे!
हम इन्सां हैं और इन्सां का मज़हब क्या.


शनिवार, 25 जून 2011

फिर उमीदों का नया दीप....

फिर उमीदों का नया दीप जला रक्खा  है.
हमने मिटटी के घरौंदे को सजा रक्खा  है.

खुश्क आंखों पे न जाओ कि तुम्हें क्या मालूम
हमने दरियाओं को सहरा में छुपा रक्खा है. 


रविवार, 19 जून 2011

ताजगी की इक इबारत.......

ताजगी की इक इबारत और क्या.   
मेरी बस इतनी सी चाहत और क्या.

बैठे-बैठे लिख रहा होगा खुदा
हम सभी लोगों की किस्मत और क्या.


मंगलवार, 14 जून 2011

हमें इस दौर के एक एक लम्हे से.....


हमें इस दौर के एक एक लम्हे से उलझना था.
मगर आखिर कभी तो एक न एक सांचे में ढलना था.

वहीं दोज़ख के शोलों में जलाकर राख कर देता
ख़ुशी का एक भी लम्हा अगर मुझको न देना था.


सिलसिला रुक जाये शायद.....

सिलसिला रुक जाये शायद आपसी तकरार का.
रुख अगर हम मोड़ दें बहती नदी की धार का.

जब तलक सर पे हमारे छत सियासत की रहेगी
टूटना मुमकिन नहीं होगा किसी दीवार का.

मार्क्स, गांधी, लोहिया, सुकरात, रूसो, काफ्का
सबपे भारी पड़ रहा है फलसफा बाज़ार का.


ज़मीं की खाक में......

ज़मीं की खाक में देखा गया है.
परिंदा जो बहुत ऊंचा उड़ा है.

हवा का काफिला ठहरा हुआ है.
फ़ज़ा के सर पे सन्नाटा जड़ा है.

मरासिम टूटने के बाद अक्सर
तआल्लुक और भी गहरा हुआ है.


रेज़ा-रेज़ा बिखर रहे हैं हम.

रेज़ा-रेज़ा बिखर रहे हैं हम.
अब तो हद से गुज़र रहे हैं हम.

एक छोटे से घर की हसरत में
मुद्दतों दर-ब-दर रहे हैं हम.


गुरुवार, 9 जून 2011

क्या ढोते बेकार के रिश्ते.

("OBO लाइव महा उत्सव" अंक ८...में प्रस्तुत)

तोड़ दिए संसार के रिश्ते. 
क्या ढोते बेकार के रिश्ते.

स्वर्ग-नर्क के बीच मिलेंगे 
इस पापी संसार के रिश्ते.

रोज तराजू में तुलते हैं
बस्ती और बाज़ार के रिश्ते.


शनिवार, 4 जून 2011

हवा में उड़ रहा है आशियाना

हवा में उड़ रहा है आशियाना.
परिंदे का नहीं कोई ठिकाना.

हमेशा चूक हो जाती है हमसे
सही लगता नहीं कोई निशाना.

अभी सहरा में लाना है समंदर
अभी पत्थर पे है सब्ज़ा उगाना.

जिसे आंखों ने देखा सच वही है
किसी की बात में बिल्कुल न आना.

मंगलवार, 31 मई 2011

जरा सी जिद ने इस आंगन का.......

(यह ग़ज़ल 28 से 30 मई तक openbooksonline.com पर आयोजित obo लाइव तरही मुशायरा, अंक-11 के लिए कही थी. तरह थी-'जरा सी जिद ने इस आंगन का बंटवारा कराया है.' काफिया-आ, रदीफ़-कराया है.)

समंदर और सुनामी का कभी रिश्ता कराया है?  
कभी सहरा ने गहराई का अंदाज़ा कराया है?

न जाने कौन है जिसने यहां बलवा कराया है.
हमारी मौत का खुद हमसे ही सौदा कराया है.

फकत इंसान का इंसान से झगड़ा कराया है.
बता देते हैं हम कि आपने क्या-क्या कराया है. 


मंगलवार, 24 मई 2011

डूबने वाले को......

डूबने वाले को तिनके के सहारे थे बहुत.
एक दरिया था यहां जिसके किनारे थे बहुत.

एक तारा मैं भी रख लेता तो क्या जाता तेरा
आस्मां वाले तेरे दामन में तारे थे बहुत.

वक़्त की दीवार से इक रोज  रुखसत हो गयी
हमने जिस तसवीर के सदके उतारे थे बहुत.


मंगलवार, 17 मई 2011

कहीं सूरज, कहीं जुगनू का......

कहीं सूरज, कहीं जुगनू का अलम रख देना.
अंधेरे घर में उजाले का भरम रख देना.

बैठकर सुर्खियां गढ़ने से भला  क्या हासिल
झूठ लिखने से तो बेहतर है कलम रख देना.


मंगलवार, 10 मई 2011

हिसारे-जां में सिमटा हूं मैं अब......

हिसारे-जां में सिमटा हूं मैं अब सबसे जुदा होकर.
दिशाएं दूर बैठी हैं बहुत मुझसे खफा होकर.

ये मेरी वज्जादारी है निभा लेता हूं रिश्ते को 
वगर्ना क्या करोगे तुम भला मुझसे खफा होकर.