(एक ऐसे बच्चे के नाम जिसे छः माह पहले उसकी मां एक नर्सिंग होम में जन्म देकर फरार हो गयी थी और जो बहुरूपिया ब्लॉग के संचालक पवन श्रीवास्तव के घर पर पल रहा है. पवन जी के भाई अशोक मानव ने उसे गोद लिया है.)
अपने पाओं पे खड़ा होने दो.
घर का बच्चा है, बड़ा होने दो.
प्यास दुनिया की ये बुझाएगा
कच्ची मिटटी है घड़ा होने दो.
(मित्रों ! यह इस ब्लॉग की 100 वीं पोस्ट है. दो नज्मों और एक कत्ते को छोड़ दें तो अभी तक इसमें ज्यादातर ग़ज़लें ही पोस्ट की गयी हैं. भाई राजेंद्र स्वर्णकार के इसरार पर जनवरी 2011 में जब मैंने इस ब्लॉग पर नियमित पोस्ट डालनी शुरू की तो उस वक़्त तक मात्र 289 पेज व्यूवर थे. सात महीने में आज यह संख्या 6331 हो चुकी है. फोलोवर भी दूने से ज्यादा बढे हैं. आपलोगों के स्नेह की बदौलत ही यह संभव हुआ है. अब इसमें साहित्य की अन्य विधाओं का भी समावेश किया जाना चाहिए या इसी रूप में आगे का सफ़र जारी रखना चाहिए इसपर विचार कर रहा हूं. मैं इसपर आपलोगों के विचार भी जानना चाहूंगा. )